आत्मसाक्षात्कार का अर्थ || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तं तेजोमयं भ्राजते तत्सुधान्तम् । तद्वाऽऽत्मतत्तवं प्रसमीक्ष्य देही एकः कृतार्थो भवते वीतशोकः॥
जिस प्रकार मिट्टी से मलिन हुआ रत्न या आभूषण शोधित होकर प्रकाशमय हो कर चमकने लगता है, उसी प्रकार देहधारी जीव आत्मतत्व का साक्षात्कार कर के शोकादि से मुक्त होता है और अद्वितीय तथा कृतकृत्य हो जाता है।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय २, श्लोक १४)
आचार्य प्रशांत: रत्न है, उसके ऊपर मिट्टी की परत चढ़ गई है। जब उसका शोधन हो जाता है, सफ़ाई हो जाती है, तो कहा जा रहा है कि वो चमकने लग जाता है। और वही उपमा दी जा रही है कि ऐसे ही जब तुम आत्मतत्व का साक्षात्कार कर लेते हो, तो फिर तुम भी शोकादि से मुक्त हो जाते हो और अद्वितीय और कृतकृत्य हो जाते हो। तो थोड़ा सा अंतर है समझना पड़ेगा।
अंतर सूक्ष्म है, जो समझेंगे नहीं वो धोखा खा जाएँगे। जब हम रत्न की बात कर रहे होते हैं और उसकी सफ़ाई करनी है क्योंकि वो मिट्टी में पड़ा था, मैला हो गया है, कीचड़ जम गया है। तो हम कीचड़ की बात ऐसे करते हैं जैसे कि वो कोई बात करने लायक चीज़ ही नहीं है, उसको जल्दी से हटाओ फिर देखो कैसे रत्न जगमगाएगा। बात का लहज़ा हमारा कुछ ऐसा रहता है।
उस पूरी बात में ध्यान कीचड़ पर बहुत ही कम दिया जाता है। सारा ध्यान किस पर दिया जाता है? रत्न पर दिया जाता है। कीचड़ को तो यूँ ही दो कौड़ी की अनावश्यक चीज़ मान लिया कि ये ज़बरदस्ती आ करके इसके ऊपर बैठ गई थी; हट गई, रत्न जगमगाने लग गया।
