अर्जुन की पात्रता || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)

सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥21॥
“हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य मेरा रथ स्थापित करें।”
~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक २१, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग
आचार्य प्रशांत: अर्जुन का ये अनुरोध मेरे मन के बड़ा निकट रहा है सदा से। दो बातें हैं यहाँ पर अर्जुन के विषय में, दोनों ही पूरे तरीके से अभी वयस्क नहीं, पल्लवित नहीं, परिपक्व नहीं लेकिन दोनों के बीज बिलकुल आरंभ में ही अर्जुन में दिखाई दे जा रहे हैं। पहला, अर्जुन को अवलोकन करना है, माने अर्जुन को ज्ञान चाहिए। दूसरा, अर्जुन जिनको देख रहा है, उनको कम-से-कम धन-धान्य, सत्ता, राज्य इनसे ऊपर का स्थान दे रहा है। साधारण सांसारिक भोग से अधिक प्रिय कुछ और उसको पता चल रहा है — ‘प्रेम’। विशुद्ध प्रेम नहीं है, मोह ज़्यादा है, पर बीज है प्रेम का। वो बीज नहीं होता तो गीता भी अर्जुन को समझ नहीं आती। “होनहार बिरवान के होत चीकने पात”; अर्जुन अलग हैं, विलक्षण हैं और वो विलक्षणता आरम्भ में ही दृष्टिगोचर हो जाती है।
एक तरफ़ दुर्योधन व्यथित है कि कैसे हरा दें जल्दी-से-जल्दी; सारी गणना ये है कि किसकी सेना बड़ी है, किसकी छोटी है, कैसे अपने सेनापति की रक्षा कर लें; दूसरी ओर अर्जुन, अंतर देखिए, नहीं गिन रहे कि कितने योद्धा इधर हैं कितने उधर हैं। दुर्योधन ने नाम गिना दिए – हमारी ओर के प्रमुख सेनानी ये हैं, उधर के प्रमुख योद्धा वो हैं इत्यादि-इत्यादि। अर्जुन को इन बातों से कोई प्रयोजन नहीं, एक तरह का वैराग्य। अर्जुन की उत्सुकता दूसरी दिशा में है, अर्जुन को जानना है। “हे केशव! दोनों सेनाओं के मध्य में मेरा रथ स्थापित करो।” ये मध्यता बड़ी विलक्षण चीज़ है, हम ये नहीं कर पाते। ‘मध्यता’ का मतलब समझिएगा। हम जिधर होते हैं हम उधर के ही होते हैं। मैं अगर पांडव पक्ष में हूँ तो मैं पांडवों का हूँ। मुझे पांडवों से दूर जाकर के पांडवों को क्यों देखना है, मुझे बीच में जाकर के पांडवों को क्यों देखना है। और अगर मैं कौरवों के विरोध में हूँ तो मैं उनसे खूब दूरी रखूँगा न, मुझे उनके निकट जाकर के उनको क्यों देखना है।



