प्रश्नकर्ता: अध्यात्म में “अन्दर” और “बाहर” से क्या आशय होता है?
आचार्य प्रशांत: जो कुछ भी मन की पकड़ में आ सके वो बाहर है। जिस भी चीज़ के बारे में तुम सोच सको वो बाहर है। जिसको तुम अन्दर कहते हो उसके बारे में भी तुम सोच लेते हो न? जिसको तुम अन्दर कह रहे हो उसके बारे में भी सोच लेते हो न? और, अगर सोच लिया किसी के बारे में तो वो कहाँ का हुआ? बाहर का। तो, अन्दर कुछ होता ही नहीं।
जिस किसी भी वस्तु, व्यक्ति, विचार, हस्ती, घटना को तुम नाम दे सको वो बाहर की हो गयी। अन्दर को तुम ने नाम दे दिया न। क्या नाम दिया अन्दर को? 'अन्दर'। और जैसे ही तुमने कहा वो अन्दर है तो वो कहाँ का हो गया? वो बाहर का हो गया। तो अन्दर जैसी कोई चीज़ होती नहीं। जो भी तुम सोचोगे, विचारोगे, धारणा करोगे, कल्पना करोगे, वो सब क्या हुआ? बाहर का हुआ।
तो अन्दर या बाहर का ये भेद मत बना लेना कि खाल के उस तरफ़ जो है वो बाहरी और जो खाल के इस तरफ़ है वो अंदरूनी। ये भ्रान्ति भी खूब चलती है, क्या? कि, शरीर से बाहर का जो है, शरीर से उस तरफ़ का जो है, वो तो हुआ बाहरी। अब शरीर के इस तरफ़, जैसे खाल कोई दीवार हो, जैसे खाल को हमने दीवार बना लिया हो और हम कहते हों, "दीवार के उस तरफ़ जो है वो कहलाएगा ‘बाहर’ और दीवार के इस तरफ़ जो है वो कहलाएगा ‘अन्दर’", ये व्यर्थ की बात है।
तुम्हारा शरीर भी बाहरी है, मन भी बाहरी है, विचार भी बाहरी हैं। इन सब को ले कर छवियाँ, नाम, मान्यताएँ, परिभाषाएँ रहती हैं न? जो कुछ भी परिभाषित हो गया वो बाहरी। तो, कोई ये ना कहे, “आँखें बाहर को देख रही हैं अब इन आँखों को अन्दर की ओर मोड़ो।” जिधर को भी आँखें मुड़ गईं, वो दिशा बाहरी है। जिधर को भी आँखें मुड़ गईं, वो दिशा बाहरी ही है। हर दिशा बाहरी है।


