प्रश्नकर्ता: कोरोना वायरस के कारण हुए लॉकडाउन ने मुझे मेरे कई ढर्रों से आज़ाद कर दिया। बहुत कुछ जो छूट ही नहीं रहा था अपने आप छूट गया। पर कल से लॉकडाउन खुल सकता है, वैसे भी सब धीरे-धीरे नॉर्मल होता जा रहा है। मुझे ये लॉकडाउन हमेशा के लिए चाहिए। कुछ रास्ता बताइए।
आचार्य प्रशांत: ज़िंदगी की छोटी से छोटी, साधारण से साधारण स्थिति भी आपके सामने आती है तो अगर आपकी सुधरने की, सीखने की नीयत है तो उस स्थिति के बाद आप वैसे ही नहीं रह जाएँगे जैसे कि आप उस स्थिति के पहले थे।
वास्तव में जीवन की हर स्थिति आपके सामने आती ही आपको कुछ सिखाने के लिए है, बेहतर बनाने के लिए है।
या ऐसे कह लीजिए कि जीवन की हर स्थिति में आपके लिए यह संभावना होती है कि उसे स्थिति का उपयोग करके कुछ सीख ले, जान ले, बेहतर हो जाएँ। यह मैंने बात करी जीवन की किसी भी साधारण स्थिति की। अभी जो वैश्विक आपदा हमारे सामने है, वह तो निश्चित ही असाधारण है। जो लोग इस आपदा के बाद भी वैसे ही रह जाएँ जैसा वो इसके पहले थे, वह तो फिर बहुत ही जड़ और ढीठ हुए। उन्होंने तो फिर ध्यान रखी है कि जीवन से कुछ सीखना ही नहीं है, अहंकार उनका इतना सघन हो चुका है कि वह बदलने को, पिघलने को राज़ी ही नहीं हैं। तो इस महामारी के प्रति भी दो तरह का रवैया रखने वाले, दो कोटियों के लोग, आपको देखने को मिलेंगे- पहले वो, जो लगातार इन दिनों आपने लॉकडाउन की बात करी, इसी कामना में, इसी प्रार्थना में इसी प्रयत्न और जुगाड़ में लगे होंगे कि किसी तरीके से पहले वाले हालात वापस आ जाएँ, ये पहली कोटि के लोग हैं।
दिसंबर से यह वैश्विक प्रकोप शुरू हुआ था, फरवरी के आसपास से इसकी आहटें भारत में भी सुनाई देनी पड़ी थी, अब तो बहुत महीने बीत चुके, मई का महीना आधे से ज़्यादा बीत चुका है। इतना लंबा समय, एक अपूर्व, असाधारण महामारी के बीच में बिल्कुल काफ़ी है, सीखने वाले को सिखाने के लिए। ज़िंदगी में पहली बार, सभी की ऐसा हो रहा है, इतने दिनों तक घरों के भीतर ही बंद रहना पड़ रहा है, सड़कें खाली हैं, बाज़ार सुनसान हैं, सब तरह के आर्थिक गतिविधियाँ, सामाजिक गतिविधियाँ शिथिल पड़ी हुई हैं। ऐसा नज़ारा किसने कब पहले देखा था? तो यह तो निश्चित ही अपूर्व है। इतनी असाधारण मार पड़ने के बाद भी, नब्बे- पच्चानवे प्रतिशत लोग वही हैं, जो मैंने कहा की कामना में और दुआ में लगे हुए हैं कि बस किसी तरह से यह बुरा सपना टूटे और किसी तरीके से यह महामारी और लॉकडाउन का समय खत्म हो और दुनिया और ज़िंदगी दोबारा वैसे ही चलने लगे जैसी 6 महीने पहले चला करती थी। यह पहली कोटि के लोग हैं, यह कुछ समझना नहीं चाहते। यह सोच रहे हैं कि यह आपदा तो यूँ ही संयोगवश आ गयी है। ज़िंदगी में तमाम तरह की घटनाएँ दुर्घटनाएँ होती रहती हैं, वैसे ही एक यह भी हो गई है। अरे! जल्दी से यह बला टले, हम अपने काम ढर्रों पर वापस आएँ। दस में से से नौ लोग ऐसे हैं।


