प्रश्न: आत्मा की जो छवि होती है, जिसको हम अपना आत्म कहते हैं, वो छवि होती है जैसे आकाश की छवि घड़े में, पानी में मिल जाती है। तो घड़े को लगता है कि उसके अन्दर आकाश है। वैसे ही हमें लगता है कि हमारे अन्दर आत्मा है क्योंकि वो छवि है आत्मा की। लेकिन आत्मा जो है, वो सर्वव्यापक है और वो छवि है, जिसे हम अपनी आत्मा मान के बैठ गए हैं। तो फिर ये भ्रम वाली बात कैसी है?
वक्ता: भ्रम वाली बात ये है कि आप आत्मा नहीं बोलते हो, आप “मेरी आत्मा” बोलते हो। और मेरी से आपका मतलब होता है; मेरा शरीर। आपने आत्मा को भी शरीर के अन्दर बैठा दिया है। जब घड़े में आकाश प्रतिबिंबित होता है, तो घड़े को ये लगता है कि मेरा आकाश है; “मेरा” क्योंकि दिखा तो मेरे अन्दर ही है न।
श्रोता: तो जो चैतन्य है, जिसको हम कहेंगे जागरूकता, वो भी…वो सब भी तो सिर्फ भ्रम ही हुए न फिर।
वक्ता: हाँ, भ्रम ही हुए।
श्रोता१: तो हमारी समझ भी फिर भ्रम ही हुई?
वक्ता: तो समझ, मन, बुद्धि थोड़ी ही है। ‘आपकी समझ’ थोड़ी ही है। जैसे चेतना आपकी नहीं होती, वैसे ही समझ भी आपकी नहीं होती है। जब तक ‘समझ आपकी है’, तब तक वो सिर्फ़ आपकी मान्यता है, मत है। वो समझ नहीं है। समझ अवैयक्तिक होती है। आपकी नहीं होती है। धर्म के इतिहास में सबसे बड़ी भूल यही हुई है कि आदमी ने आत्मा को शरीर के भीतर अवस्थित कर दिया है।


