आज का युद्ध, आज का कुरुक्षेत्र, और आज का धर्म || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्न: आचार्य जी, मुझे अध्यात्म में बहुत कुछ सीखने को मिला है लेकिन मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरे हाथ में धनुष है, प्रत्यंचा खींची हुई है लेकिन मैं तीर नहीं चला पा रहा हूँ, और मैं तनाव में हूँ। मैं तनाव में क्यों हूँ?
आचार्य प्रशांत: यह तनाव उन्हीं के हिस्से की चीज़ है जिन्हें कुछ समझ में आने लगा है। इस युग में आपको यह सुविधा उपलब्ध नहीं है कि आप 'सत्य' को जानें और फिर भी आप अपने सामान्य, साधारण जीवन में रत रहे आएँ। रहे होंगे ज़माने पुराने, जब यह हो सकता था कि आप सत्य के साधक हुए तो या तो आप समाज से कट गए, या फिर समाज में रहे भी तो चुपचाप अपना कोई छोटा-मोटा काम करते रहे और राम-भजन करते रहे। कोई अपनी छोटी दुकान चला रहा है, कोई किसानी कर रहा है और प्रभु की माला जप रहा है—वह ज़माने दूसरे थे।
यह एक विचित्र संक्रमण काल है। इस समय अगर आपने कुछ जाना है तो उसे आपको कर्म में परिणित करना पड़ेगा। यह इस युग की बात है।
थोड़ा उदाहरण से समझिएगा। दो उदाहरण लूँगा—एक वेदांत से और दूसरा सिख गुरुओं से। प्रस्थानत्रयी होती है सनातन धर्म में—उसमें उपनिषद आते हैं, श्रीमद्भगवद्गीता आती है, ब्रह्मसूत्र आते हैं। उपनिषदों को लीजिएगा और श्रीमद्भगवद्गीता को लीजिएगा। बात तो उनमें एक ही कही गई है, ठीक? अब दो दृश्य आमने-सामने रखिएगा। ऋग्वेद के या यजुर्वेद के कोई ऋषि अपने शिष्यों को ज्ञान दे रहे हैं। तो ऋषिराज बैठे हुए हैं और सामने शिष्य हैं; बहुत ज़्यादा नहीं होते थे, दस-बीस। वह बैठे हुए हैं, उनको समझाया जा रहा है। शांत माहौल है। समझा दिया गया और समझ जाने के उपरांत शिष्य सब चले गए। कोई पूजा में लग गया, कोई जंगल निकल गया लकड़ी बीनने के लिए, कोई स्वाध्याय के लिए बैठ गया थोड़ी देर, कोई थोड़ा ध्यान में बैठ गया, यह सब चल रहा है। शांत माहौल है।
ज्ञान के उपरांत हमें दैनिकचर्या दिखाई देती है—गुरु ने शिष्य से बात कही, शिष्य चला गया है, कोई छोटा काम कर रहा है, कोई मोटा काम कर रहा है, कोई इधर, कोई उधर। ठीक वही बात कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं। कृष्ण ने भी ज्ञान दिया और अर्जुन ने भी ज्ञान पाया। लेकिन ज्ञान पाने के तत्काल बाद अर्जुन ने क्या किया? युद्ध किया। अब यह तो अजीब बात है! वही ज्ञान उपनिषदों के शिष्यों को उपलब्ध हो रहा है तो वह शांतिपूर्वक जाकर हवन-पूजन कर रहे हैं, या क्या पता कोई सोने ही चला गया हो, कोई चुपचाप जाकर जंगल में बैठ गया हो, कोई बंसी बजाने लगा तो वहाँ तो ऐसा लगा कि ज्ञान से आती है—शांति। देखो इन्हें ज्ञान मिला और ये सब जाकर के कितनी शांति से बैठ गए। और ठीक वही ज्ञान—प्रस्थानत्रयी में वेदांत और श्रीमद्भगवद्गीता बिल्कुल अगल-बगल रखे जाते हैं—जब श्रीमद्भगवद्गीता में कृष्ण अर्जुन को दे रहे हैं तो अर्जुन ने वही ज्ञान पाया और उसके बाद तीरों की वर्षा की।

