कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन। सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः।।
हे अर्जुन! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है—इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है—वही सात्विक त्याग माना गया है।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १८, श्लोक९
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मैं एक शिक्षक हूँ। मुझे विद्यालय शासन द्वारा बनाए गए नियम ठीक नहीं लगते पर अनुगमन न करूँ तो नौकरी मुश्किल में पड़ जाती है और मानसिक उथल-पुथल मच जाती है, सत्य की राह पर चलना मुश्किल पड़ता है। शास्त्रविहित कर्म क्या है? इस स्थिति में शास्त्रविहित कर्म पर हम कैसे चलें?
आचार्य प्रशांत: शास्त्रविहित कर्म है कर्ता की इच्छाओं की उपेक्षा करके बस वह करना जो कर्ता का धर्म है।
इच्छा और धर्म का अंतर समझेंगे।
इच्छा वह जो आपको तत्काल सुख का प्रलोभन देती है। धर्म वह जो आपको कालातीत आनंद की चुनौती देता है। कह सकते हैं कि सस्ते सुख का संबंध होता है इच्छा से और ऊँचे सुख का संबंध होता है धर्म से। शास्त्रविहित कर्म वो है जो ऊँचे सुख के लिए किया जाए।




