आचार्य प्रशांत: राघव ने प्रश्न पूछा है, कहते हैं, “आचार्य जी प्रणाम, ज़िन्दगी में लगातार एक अभाव का विचार बना रहता है। जब किसी चीज़ में डूब जाता हूँ, या जब संतों को सुनता हूँ और पढ़ता हूँ, तो वो चला जाता है, लेकिन पुनः वापस आ जाता है। कोई भी चीज़ इस आंतरिक प्यास को बुझा नहीं पा रही है। ये शायद इसीलिए है क्योंकि मुझे अपना काम पसंद नहीं है और उसपर भरोसा भी नहीं है। ये भरोसा नहीं है कि जो कुछ भी मैं कर रहा हूँ वो सार्थक चीज़ है। तो मैं करना तो चाहता हूँ उसको, जो सार्थक है सचमुच, पर मैं मजबूर हूँ।"
ये सब, राघव, किस्सेबाज़ी है।
क्या है सार्थक, जिसे तुम करना चाहते हो? और जो तुम करे जा रहे हो, तुम्हें कैसे पता वो सार्थक नहीं है?
सत्य की दुनिया में देखना और करना साथ-साथ होते हैं। जैसे दो बिलकुल करीब की समानांतर रेखाएँ। इतने करीब की, इतने करीब की, कि जैसे एक हो गई हों।
तुम सार्थक की चिंता बिलकुल छोड़ दो। उन सबसे कह रहा हूँ जो सत्य के, या सार्थकता के साधक हैं, खोजी हैं, प्रेमी हैं। तुम सत्य की चिंता छोड़ो, हटाओ, तुम अपनी खोज रद्द करो। तुम मुझे पहले ये बताओ कि क्या तुम्हें ठीक-ठीक पता है कि अभी तुम जिसमें उद्यत हो वो निरर्थक है? नहीं, तुम्हें ये नहीं पता।
तुम अपने वर्तमान जीवन की निरर्थकता का पूर्ण बोध किए बिना किसी अन्य सार्थकता में कूदना चाहते हो। वास्तव में तुम झूठे आदमी हो। तुम्हारी मंशा क्या है बताए देता हूँ।

