निर्णय के लिए दूसरों पर निर्भरता || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)

श्रोता: सवाल है कि ‘क्यों हम अपने निर्णय स्वयं नहीं ले पाते और इस कारण दूसरों पर आश्रित रहते हैं?’
वक्ता: कितने लोग ऐसे हैं जिनकी यही कहानी है कि अपने निर्णयों के लिए दूसरोँ पर आश्रित रहना पड़ता है? हाथ खड़े करें।
*(**सभी श्रोतागण हाथ खड़े करते हैं)*ये हम सब की कहानी है। अब जो कहूंगा वो ध्यान से सुनना क्योंकि वो कोई रटी-रटाई बात नहीं होगी जो तुमने बहुत बार सुन रखी हो। जब तक तुम्हें निर्णय लेने पड़ रहे हैं, तब तक तुम्हें दूसरोँ पर आश्रित होना ही पड़ेगा। जब तक तुम्हें निर्णय लेने पड़ रहे हैं, तुम्हें दूसरों का सहारा लेना ही पड़ेगा। निर्णय का अर्थ है, ‘बहुत सारे विकल्प हैं’। निर्णय तभी लेते हो जब कई विकल्प हों?
श्रोता: जी सर।
वक्ता: निर्णय का अर्थ ही है कि उन विकल्पों में से मुझे सूझ नहीं रहा है, कि मेरे लिए उचित क्या है और मैं फँस गया हूँ। कई राहें खुल रहीं हैंऔर उन राहों में से मुझे किधर चलना है मैं जान नहीं पा रहा। अब मुझे आवश्यकता पड़ रही है निर्णय लेने की। जहाँ कहीं भी निर्णय लेने की आवश्यकता है, वहाँ पर एक ऐसा निर्णय-कर्ता खड़ा हुआ है जो कहेगा कि अब मुझे निर्णय लेना है। भई, अगर डिसिशन मेकिंग होनी है तो डिसिशन मेकर भी होगा ना? अब तुम मुझे बताओ कि ये जो निर्णयता है, ये कौन है?
श्रोता: मन।
