न कैद की कसक, न मुक्ति की ठसक || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)

हद चले सो मानवा, बेहद चले सो साध।
हद बेहद दोनों तजे, ताका मता अगाध।।
~ संत कबीर ~
वक्ता: और ये आपने लिखा है:
हद टपे सो औलिया, बेहद टपे सो पीर।
हद बेहद दोनों टपे, ताका नाम कबीर।।
दोनों एक ही हैं। आदमी लगातार रहता है वर्जनाओं में, सीमाओं में। ये आपका साधारण मानव है, गृहस्थ, यही आपकी अधिकांश जनसंख्या है। ‘हद चले सो मानवा, ’ वो अपनी हदों में कैद रहता है हमेशा। उसके लिए जीवन का मतलब ही है सीमाएं, उसके शरीर की सीमाएं, मन की सीमाएं, समाज की सीमाएं, समय की सीमाएं। ‘हद चले सो मानवा’’ । ध्यान से देखेंगे जब, तो दिखाई देगा कि हमारे लिए जीवन का और कोई अर्थ है ही नहीं, सीमाओं के अलावा। आप जो कुछ भी कहेंगे वो सीमित ही होगा, आप जीवन को जो भी अर्थ देंगे, वो अर्थ ही इसीलिए हैं क्योंकि उसकी एक सीमा खिंची हुई है। सीमा हटा दीजिए, अर्थ ख़त्म हो जाएगा।



