मात्र इन्द्रियाँ ही शरीर व संसार का प्रमाण || आचार्य प्रशांत (2014)

श्रोता: सर एक बात समझ में नहीं आती कि हम हैं क्या? जो हमारी इन्द्रियाँ हमें दिखाती हैं हम वही हैं क्या या कुछ और?
वक्ता: हमें बड़ी आसानी हो जाती है यह मान लेने में कि जो कुछ भी दिखाई दे रहा है वो सिर्फ द्वैत का एक भ्रम है, ये हम मान लेते हैं। उसके प्रमाण भी हैं। हमें कोई दिक्कत नहीं होती ये मानने में कि अगर यह दीवार है, इसको देखा न जा सके और इसको छुआ न जा सके तो ये दीवार रहेगी ही नहीं। ये दीवार कुछ और नहीं है मेरी इन्द्रियाँ हैं। मेरे पास पांच इन्द्रियाँ हैं और मैं संसार उसी को कहता हूँ जो इन पांच इन्द्रियों से और मन से अनुभव में आ सके।
जो कुछ भी इन पांच इन्द्रियों से और मन से अनुभव में ना आ सके क्या मैं उसे संसार कहूँगा ही नहीं और जो ये पाँचों इन्द्रियाँ हैं, ये भी इसी तरीके से अपने विषयों पर निर्भर हैं। संसार इन्द्रियों पर निर्भर है, इन्द्रियाँ विषयों पर निर्भर हैं। अगर आँख कुछ देख ही न पा रही हों तो उसे आप आँख कहेंगे क्या? तो आँख विषय पर निर्भर है और विषय का होना आँख पर निर्भर है।
इस दीवार का होना मात्र तभी तक है जब तक यह दिखती हो याँ इसे छुआ जा सकता हो। न दिखती हो, न छुई जा सकती हो तो कहाँ है दीवार। इस दीवार का होना पूरी तरह निर्भर करता है आपकी आँखों पर और आपकी त्वचा पर। त्वचा छू न पाए; हाथ छू न पाए और आँख देख न पाए तो कोई दीवार नहीं। थोड़ा आप आगे जा सकते हैं, आप ये भी कह सकते हैं कि मन विश्लेषण न कर पाए; दो के बाद एक तीसरी शर्त और जोड़ दीजिए—आँख देख न पाए, हाथ छू न पाए, और मन विश्लेषण न कर पाए तब भी क्या कोई दीवार शेष है?
नहीं है।
संसार में जो कुछ है वो हमारी इन्द्रियों पर निर्भर है।इन्द्रिय, इन्द्रिय तभी तक है जब तक कि वो संसार का एहसास करातीं है।
