प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बड़ों से मिली सीख का बच्चों के जीवन पर प्रभाव पड़ता है। हमारे बड़े, या स्पष्ट कहूँ तो माँ-बाप द्वारा दी गई सीख संतान अपने जीवन में उपयोग करते हैं। अगर माता-पिता ग़लत हों, तो उनके द्वारा दी गई सीख भी ग़लत ही होती है, फिर वो कहते हैं कि तुम्हें अक़्ल नहीं है, तुम दुनियादारी नहीं जानते। ये कहाँ का नियम है?
सत्य जो है, वो तो सत्य ही रहेगा, चाहे सामने कोई भी हो। मेरा जीवन अस्त-व्यस्त है, उसका कारण ये भी है कि मैं सत्य को सत्य कहने की कोशिश करता हूँ, लेकिन बड़ी मुसीबत आती है, लोग कहते हैं कि ज़रा कूटनीति सीखो, और कूटनीतिज्ञ होना मेरा स्वभाव नहीं। इनसे कैसे पार पाऊँ?
आचार्य प्रशांत: सत्य की नाव, सत्य खिवैया, सत्य के ही चप्पू, तुम्हें क्या पार पाना है? जिसे पार पाना है, वो पा लेगा। अगर सत्य के इतने मुरीद हो तुम, तो तुम्हें फिर ये भी पता होगा कि सत्य के आगे न सिर्फ़ झूठों की कोई हैसियत नहीं है, बल्कि सच्चों की भी कोई हैसियत नहीं है। परमात्मा के आगे तो पापी और पुण्यात्मा, सब बित्ते-बित्ते भर के हैं, है न? ये तो तुम यहाँ बख़ूबी कह दे रहे हो कि तुमको दिखता है कि दूसरे झूठे हैं, उसी दृष्टि से ये भी तो देखो कि तुम बहुत छोटे हो। तुम्हारा एक ही काम हो सकता है – अपने छुटपन को स्वीकारना, और तुम्हारे भीतर जो बादशाह बैठा है, उसकी सेवा में लग जाना। आगे का काम वो बादशाह देखेगा।
कहा न, राम की नाव, राम ही खिवैया, वो कर देगा, तुम क्यों परेशान हो रहे हो? तुम्हारी परेशानी तो मुझे ये बता रही है कि तुम भी किसी-न-किसी झूठ में फँसे हुए हो। जो झूठ में नहीं फँसा हुआ, वो परेशान कैसे होगा? अगर झूठ तुम पर भारी पड़ता है तो एक बात पक्की है कि लड़ाई सच और झूठ की नहीं चल रही है, लड़ाई झूठ और झूठ की ही चल रही है। अगर झूठ तुम पर भारी पड़ता है और यही तुम्हारा सवाल है कि, "असहाय, असमर्थ हो जाता हूँ", तो एक बात पक्की समझ लेना कि दूसरी तरफ़ अगर झूठ है तो तुम्हारी तरफ़ भी झूठ ही है; क्योंकि झूठ पर तो कोई भी भारी पड़ सकता है, और झूठ जिस पर भारी पड़ता हो, वो कोई दूसरा झूठ ही होगा। सच पर झूठ कभी नहीं भारी पड़ता, तुम पर झूठ कैसे भारी पड़ने लग गया? अब तुम पता करो, जाओ, कि कौन-से झूठों के साथ तुम अभी फँसे हुए हो। जैसे ही उनको हटाओगे, वैसे ही तुम्हारा रास्ता प्रशस्त हो जाएगा, फिर कोई नहीं रोक सकता।

