Forget God. Who are you? || Acharya Prashant, on Saint Kabir (2017)

पानी बीच बतासा संतों,
तन का यही तमासा है।।
क्या ले आया, क्या ले जाएगा,
क्या बैठा पछताता है।।
मूठी बाँधे आये जगत में,
हाथ पसारे जाता है।।
किसकी नारी, कौन पुरुष है,
कहाँ से लगता नाता है।।
बड़े निहाल, खबर ना तन की,



