दिल से तो उसी को चाहते हैं || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः। विहोत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः॥
जिसमें सभी ब्राह्मण आदि अपने मन तथा चित्त को लगाते हैं, जिनके निमित्त अग्निहोत्र आदि का विधान किया गया है, जो सभी प्राणियों के विचारों को जानते हैं, उन सविता देव की हम महती स्तुति करें।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय २, श्लोक ४)
आचार्य प्रशांत: तो दो तीन बातें कही गई हैं। पहली बात, "जिसमें सभी ब्राह्मण आदि अपने मन तथा चित्त को लगाते हैं।" ब्राह्मण माने वो जो यदि ब्रह्मवेत्ता नहीं है तो कम-से-कम ब्रह्म का आग्रही है। ब्रह्म माने? पूरी सच्चाई। तो ब्राह्मण या तो वो जो पूरी सच्चाई से अवगत है, जो पूरी तरह सच्चा हो ही गया, या कम-से-कम वो उस पूरी सच्चाई का प्रार्थी है, आग्रही है कि मुझे पता तो चले।
तो "जिसमें सभी ब्राह्मण आदि अपने मन तथा चित्त को लगाते हैं।" तो ब्राह्मण वो जो उस एक सच्चाई तक पहुँचने के लिए प्रणबद्ध हो। ब्राह्मण वो नहीं जो ब्राह्मण घर में जन्म इत्यादि ले गया है या कुल के कारण अपने-आपको ब्राह्मण कह रहा है। ब्राह्मण वो जो सच तक पहुँचने की बड़ी प्रबल, बड़ी अकाट्य इच्छा रखता हो।
"जिसमें सब ब्राह्मण आदि अपने मन तथा चित्त को लगाते हैं, जिनके निमित्त अग्निहोत्र आदि का विधान किया गया है।" अग्निहोत्र माने यज्ञ। जिस अपनी अंदरूनी सच्चाई तक पहुँचने के लिए यज्ञ करने को कहा गया है, वो जो गहरी कामना जिसकी पूर्ति के लिए एक सच्चा साधक अपनी बाकी सब कामनाओं की बलि देने को तैयार हो जाता है, वो है सवितादेव, माने वो है अहम् वृत्ति। और उस अहम् वृत्ति को संबोधित करके कहा गया है कि वो तो प्राणियों के विचारों को जानते हैं। सविता प्राणियों के विचारों को जानते हैं।
