प्रश्न: यहाँ तक तो ठीक है कि मैं जानूँ कि दुनिया कैसी है? मेरे भाई कैसे हैं? मेरा दोस्त कैसा है? मेरी संगति कैसी है? समाज कैसा है? यहाँ तक तो मेरा मन अनुमति देता है पर जब बात आती है अपने को भीतर से जानने की तब बहुत डर लगता है, मन बाधा खड़ी करता है| खुद को क्यों जानू? ये बाधा क्यों खड़ी होती है? मुझे क्या करना चाहिए?
वक्ता: कोई ठोस विधायक अस्तित्वमान इकाई नही है “मैं” जिसे जानना है| अभी बैठे हो यहाँ पर तुम्हें तुम्हारे शरीर का पता सिर्फ स्पर्श से चल सकता है और जब पता चलता है तब स्पर्श का और शरीर का एक साथ चलता है| तुम्हारे पास शरीर है ही नहीं यदि उसे बाहर से कुछ स्पर्श न कर रहा हो|
तुम्हें तुम्हारा पता बाहरी के माध्यम से ही चलता है| तुम्हारे पास कान है, इसका प्रमाण क्या है तुम्हरे पास? इसका प्रमाण सिर्फ यही है की कुछ बाहरी है जिसे तुम सुन पाते हो और जब तुम सुनते हो तो तुम्हें बाहरी के और अपने कान के होने का पता एक साथ चलता है अलग-अलग नहीं| तो दृश्यों का और आँखों का होना एक साथ है, स्वाद का और जीभ का होना एक साथ है, संसार का और जीव का होना एक साथ है| संसार का और जीव का होना एक साथ है|
तुम अपने आप को जानते हो दुनिया के सन्दर्भ में| एक रेखा हम खींच देते हैं पर विभाजन कृत्रिम है| हम कहते हैं, “रेखा के उस पार दुनिया और रेखा के इस पार मैं|” पर ये विभाजन कृत्रिम है क्योंकि तुम्हें जब भी पता लगा है अपना, तो अपना और दुनिया का एक साथ लगा है और तुमने जब भी बात की है दुनिया की अपने ही सन्दर्भ में की है, कुछ हो कर के की है| दुनिया तुम्हारे लिये कोई ऑब्जेक्टिव कोई अव्यक्तिगत सत्य नहीं है|
दोनों बिलकुल जुड़े हुए है दुनिया और तुम, संसार और जीवन| मैं दोहरा रहा हूँ दुनिया की बिलकुल भी कोई वस्तुनिष्ठ सत्ता नहीं है| कोई ये न सोचे कि ऑब्जेक्ट और सब्जेक्ट को अलग अलग जाना जा सकता है या उनकी अलग अलग सत्ता है| जो खुद को जानने निकलता है वो दुनिया को जान जाता है| ये वैसा ही है कि कोई देह को जानने निकले और स्पर्श को जान जाए| और जो दुनिया को जानने निकलता है वो खुद को जान जाता है ये ऐसा ही है की कोई स्पर्श को जानने निकले और देह को जान जाए| याद रखना देह और स्पर्श दोनों क्योंकि एक दूसरे पर निर्भर है इसलिए है दोनों ही नहीं|


