आचार्य प्रशांत: नवदुर्गा का आरंभ हो चुका है और उचित ही है कि इस काल में हम पूरे ध्यान, पूरे समर्पण के साथ देवी-विषयक चर्चा करें। मैं संदर्भ को थोड़ा व्यापक रखना चाहूँगा ताकि हम बात को बिल्कुल मूल से समझ सकें और जितने भी लोग यहाँ उपस्थित हैं, सब से आग्रह रखूँगा कि एकदम साथ-साथ चलें, पूछते चलें, स्पष्टीकरण माँगते चलें। उससे आप लोगों को भी और बाद में भी जितने लोग इस चर्चा को देखेंगे और सुनेंगे, सबको सुविधा रहेगी।
तो ‘देवी’ शब्द जब हमारे कान में पड़ता है तो हमें सबसे पहले ध्यान आता है मंदिरों में जो हमने देवियों की मूर्तियाँ देखी हैं, जिनकी हमने उपासना करी है, आरतियाँ की हैं। पर देवी की उपासना जितना हम सोच सकते हैं, उससे कहीं ज़्यादा पुरानी है। मातृशक्ति में कुछ ऐसा रहस्य रहा है मानव चित्त का, देवी शक्ति, माँ, मातृदेवी या मातृशक्ति के प्रति कुछ ऐसा खिंचाव रहा है कि मानवीय चेतना के लगभग आरंभ से ही मनुष्य किसी-न-किसी रूप में मातृशक्ति का उपासक रहा है।
जो पुरापाषाण काल है, पेलियोलिथिक एज, जिसमें हमारा निन्यानवे प्रतिशत इतिहास है, अभी बारह-चौदह हज़ार साल पहले तक हम उसी काल में थे। पुरापाषाण काल, ओल्ड स्टोन एज, उसमें भी हम पाते हैं कि मनुष्य नारी शक्ति का उपासक रहा है। और अगर हम सिर्फ़ सीधे-सीधे विज्ञान और इतिहास की दृष्टि से देखें तो उस काल में तो कोई संगठित या व्यवस्थित धार्मिक परंपरा भी नहीं थी। मनुष्य की चेतना जैसे प्रकृति के गर्भ से बाहर आकर बस अपनी नन्हीं आँखें खोल ही रही थी। सनातन धर्म था पर कोई धार्मिक व्यवस्था या परंपरा नहीं थी।
देखिए, सनातन धर्म का संबंध किसी ग्रंथ, शास्त्र, समुदाय या संप्रदाय से नहीं होता, उसका संबंध तो चेतना मात्र से होता है। चेतना का चैन, विश्राम और मुक्ति के प्रति सहज, स्वाभाविक आकर्षण ही सनातन धर्म है।


