मैंने यह किताब जिज्ञासा में पढ़नी शुरू की थी, लेकिन पढ़ते-पढ़ते खुद से जुड़े कई सवाल सामने आने लगे। आचार्य प्रशांत की भाषा सीधी है, लेकिन बात बहुत गहरी है। यह किताब सोचने की आदत बदल देती है।