संस्था से संपर्क हेतु इस फॉर्म को भरें: http://acharyaprashant.org/enquiry?formid=201 या कॉल करें: +91- 9650585100/9643750710 आप अपने प्रश्न इस नम्बर पर व्हाट्सएप्प कर सकते हैं: +91-7428348555 ~~~~~~~~~~~~~ आचार्य प्रशांत संग ऑनलाइन पाठ्यक्रमों में भाग लेने के लिए: https://solutions.acharyaprashant.org ~~~~~~~~~~~~~ आचार्य प्रशांत से मुलाकात हेतु, और उनकी जीवनी, कृतित्व, पुस्तकों, व मीडिया के लिए: https://acharyaprashant.org ~~~~~~~~~~~~~ इस अभियान को, और लोगों तक पहुँचाने में आर्थिक सहयोग दें: http://acharyaprashant.org/donate ~~~~~~~~~~~~~ वीडियो जानकारी: शब्दयोग सत्संग, 04.03.2014, नॉएडा, भारत प्रसंग: ~खुद को जानने की कोशिश तुम्हें खुद से दूर ही ले जायेगी ऐसा क्यों कह रहे है? अष्टावक्र ~क्या आत्म ज्ञान अभ्यास करके जाना जा सकता है? ~विधि कितना आवश्यक है ध्यान के लिये? संगीत: मिलिंद दाते ~~~~~~~~~~~~~ अध्याय १८ श्लोक ३५ शुद्धं बुद्धं प्रियं पूर्णं निष्प्रपंचं निरामयं। आत्मानं तं न जानन्ति तत्राभ्यासपरा जनाः॥ ~अष्टावक्र गीता अर्थ: आत्मा के सम्बन्ध में जो लोग अभ्यास में लग रहे हैं, वे अपने शुद्ध, बुद्ध, प्रिय, पूर्ण, निष्प्रपंच और निरामय ब्रह्म-स्वरूप को नहीं जानते |