Coverage of his work in the national and international press: his gatherings, dialogues, recognitions, and milestones.

Renowned philosopher and bestselling author Acharya Prashant returned to India on Sunday after presenting eloquently on Indian philosophy, Vedanta and Upanishads at renowned global forums like Oxford University, Cambridge University and the UK Parliament. A large crowd gathered at Indira Gandhi International Airport to greet him with the tricolor, welcome messages, and congratulatory letters.

Nearly 145 years after Max Muller carried the Isha Upanishad to Oxford as a scholarly object, Acharya Prashant returned it to the same university as a living teaching — arguing, in the very building where economics and policy are taught, that no external solution can resolve humanity's crises without first examining the consuming ego that drives them.
दैनिक भास्कर में प्रकाशित लेख के अनुसार ग्रेटर नोएडा में आयोजित 'गीता समागम' श्रृंखला के तीसरे अध्याय 'कर्मयोग' पर आचार्य प्रशांत ने सत्र का संचालन किया। इस सत्र में उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों को सरल और सहज भाषा में प्रस्तुत कर, आम लोगों के जीवन को अर्थपूर्ण और आसान बनाने की दिशा में मार्गदर्शन दिया।

Philosopher Acharya Prashant returned to India on Sunday after a landmark leg of his United Kingdom tour that took him to the platforms of Oxford University, Cambridge and the UK Parliament, where he placed the teachings of Vedanta and Indian Philosophy at the centre of global discourse on some of the defining questions of our times.

In 1879, Professor Max Muller carried the Ishavasya Upanishad to the West, publishing its first English translation through Oxford University Press as the opening volume of the 'Sacred Books of the East'. Nearly a century and a half later, an Indian philosopher has arrived at the same university to return the text to its living meaning.
FOR THE PRESS

आचार्य प्रशांत ने दैनिक जागरण में लिखा है कि जीवन में दुःख आएगा, और यह भी सत्य है कि दुःख चला जाएगा। वे कहते हैं कि जब तुम्हारे जीवन में दुःख आएगा, तो तुम्हारा रोना स्वाभाविक होगा, लेकिन जब दुःख चला जाएगा, तब भी तुम रो सकते हो। इसका मतलब यह है कि पहले आँसू दुःख के होते हैं और दूसरे आँसू दुःख से मुक्ति के होते हैं।

साहित्य आज तक के मंच पर आचार्य प्रशांत ने कहा कि जो दुनिया कर रही है, आपको करने के लिए कह रही है उसे परखो। परखने का अपना अधिकार कभी नहीं छोड़ना चाहिए। आचार्य प्रशांत ने युवाओं के बारे कहा,'युवा चाहते हैं कि जिंदगी का ऊंचे से ऊंचा इस्तेमाल करें, लेकिन उन्हें कहीं भी आदर्श नहीं दिख रहे होते हैं।

News 24 के मंच पर आचार्य प्रशांत ने कहा कि देखों, त्यौहार तो एक ही होता है और त्यौहार की रोशनी भी एक ही होती है। तो इनके अनुसार, दिवाली का मतलब जब मन रौशन हुआ तब दिवाली जानो।

आचार्य प्रशांत ने पत्रिका के इस लेख में कहा कि त्यौहार का मतलब होता है- ‘आप राम की ओर वापस गए।’ त्यौहार का मतलब होता है कि अंधेरे को रोशनी की सुध आ गई और अंधेरा जब रोशनी की तरफ मिटता है तभी उसके कदम बढ़ते हैं। दिवाली राम की कोई घर वापसी नहीं होती, आप की राम वापसी होती है।
During the Geeta Deepotsav programme held at Gautam Buddha University in Greater Noida on Monday, Acharya Prashant dwelt on the outer and inner celebration of Deepawali. He emphasized that while outer celebration is important, it is devoid of any meaning if one's life is not illuminated by the inner light of wisdom. 'Superficial celebrations in the name of religion, devoid of spiritual depth, do not lead to genuine fulfillment,' he said, adding that without inner transformation, Deepawali celebration is meaningless.

इस लेख में दैनिक भास्कर ने प्रकाशित किया है की आचार्य प्रशांत ने गीता दीपोत्सव में कहा कि जीवन बदलने के लिए ज्ञान का एक दीपक ही पर्याप्त है। इस समारोह में देश के विभिन्न राज्यों से हजारों साधक पहुंचे। आचार्य प्रशांत ने संत कबीर के दोहों पर विस्तार से चर्चा की और बताया कि दिवाली तभी सार्थक होती है जब मन में भी प्रकाश हो। उन्होंने गीता के महत्व पर भी प्रकाश डाला और बताया कि यह ग्रंथ मानव को जीवन जीने का सही मार्ग दिखाता है। समारोह में उपस्थित साधकों ने आचार्य प्रशांत के प्रवचनों से प्रेरणा प्राप्त की और ज्ञान के इस दीपक को अपने जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया।

इस लेख में दैनिक भास्कर ने प्रकाशित किया है की आचार्य प्रशांत ने गीता दीपोत्सव में कहा कि जीवन बदलने के लिए ज्ञान का एक दीपक ही पर्याप्त है। इस समारोह में देश के विभिन्न राज्यों से हजारों साधक पहुंचे। आचार्य प्रशांत ने संत कबीर के दोहों पर विस्तार से चर्चा की और बताया कि दिवाली तभी सार्थक होती है जब मन में भी प्रकाश हो। उन्होंने गीता के महत्व पर भी प्रकाश डाला और बताया कि यह ग्रंथ मानव को जीवन जीने का सही मार्ग दिखाता है। समारोह में उपस्थित साधकों ने आचार्य प्रशांत के प्रवचनों से प्रेरणा प्राप्त की और ज्ञान के इस दीपक को अपने जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया।

Acharya Prashant explores the timeless wisdom of the Bhagavad Gita and the profound significance of Diwali during the Geeta Deepotsav at Gautam Buddha University. Emphasizing selfless action and inner illumination, he delves into the Gita's teachings on overcoming ego and ignorance for a meaningful life in today's world.

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत कहते हैं की रावण हो या हनुमान, या फिर विभीषण हृदय में तो सबके राम ही होते हैं। हनुमान का ये है कि राम उनके हृदय में भी हैं, और राम उनके जीवन में भी हैं। रावण का ये है कि जीवन तो उसका रावण का है और दिल उसने राम को दे रखा है। तो फिर वहां पर क्या आ जाता है? विभाजन आ जाता है, द्वंद आ जाता है।

TV9 के इस लेख में आचार्य प्रशांत कहते हैं की आंतरिक विभाजन का ही नाम रावण है और सत्य के अतिरिक्त, आत्मा के अतिरिक्त जो कुछ भी है वो विभाजित है. जहां विभाजन है, वहांं आप चैन नहीं पा सकते. राम का कोई केंद्र ही नहीं है, जो मुक्त आकाश का हो गया वही राम है. आकाश का केंद्र आप नहीं बता पाएंगे. आकाश में तो तुम जहां पर हो वहीं पर केंद्र है; अनंत है

आचार्य प्रशांत ने राष्ट्रीय सहारा में लिखा है कि नवरात्रि का समय शक्ति की समझ के लिए उपयुक्त है। वे बताते हैं कि शिव केंद्र और शिव सत्य का मतलब है कि शिव शाश्वत सत्य और शांति का प्रतीक हैं। वहीं, शक्ति जीवन का प्रतीक है, जो जीवन को ऊर्जा और गति प्रदान करती है। आचार्य प्रशांत के अनुसार, नवरात्रि के अवसर पर हमें शक्ति की इस महत्वपूर्ण भूमिका को समझना चाहिए और इसे अपनी जीवन यात्रा में एक मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार करना चाहिए।

आचार्य प्रशांत ने अमर उजाला में लिखा है कि विचार और भावनाओं के बीच की दीवार बहुत पतली होती है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति भावनाओं से मुक्ति पा लेता है और भावनाओं को महत्व देना कम कर देता है, उसने एक बड़ी लड़ाई जीत ली है। आचार्य प्रशांत के अनुसार, भावनाएं अक्सर हमारे विचारों को प्रभावित करती हैं और इस तरह से जीवन की सच्चाई को देखने में बाधा डालती हैं। जब हम भावनाओं को कम महत्व देते हैं और उन्हें नियंत्रित कर लेते हैं, तो हम मानसिक और आध्यात्मिक दृष्टि से स्वतंत्रता प्राप्त कर सकते हैं।

आचार्य प्रशांत ने दैनिक जागरण में इज़राइल-हमास युद्ध पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि युद्ध का कारण यह है कि जब हर व्यक्ति अपनी मान्यता और विश्वास पर अडिग रहेगा, तो संघर्ष होना स्वाभाविक है। वे बताते हैं कि जब लोग अपनी-अपनी मान्यताओं और विचारधाराओं पर जोर देते हैं और किसी भी समझौते या सहमति के लिए तैयार नहीं होते, तो टकराव और संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है।

आचार्य प्रशांत अमर उजाला में लिखते हैं, धर्म का वास्तविक उद्देश्य होता है इंसान को उसके बंधन से और दुःख से आजाद करना और जब धर्म वास्तविक नहीं होता, आपको आनंद नहीं दे पाता तो आप चिढ़े-चिढ़े घूमते हो क्योंकि सब कुछ पालन करने के बाद भी भीतर से कोई त्रिप्ती शांति मिल नहीं रही होती। ऐसे में कोई आ करके थोड़ा आपको कोच दे, थोड़ा आपके जो भी इष्ट हैं, उनको एक दो चुभती बातें बोल दे तो आप के भीतर तुरंत विस्फोट हो जाएगा, हिंसा ऐसे ही जन्म लेती है।

Acharya Prashant delves into the causes of conflict and cruelty rooted in religious beliefs, highlighting how personal interpretations and faith differences escalate tensions, using the Israel-Hamas conflict as a case study. He advocates for a deeper, introspective approach to religion that fosters understanding and respect amidst diversity.

आचार्य प्रशांत ने विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर लिखा है कि आज बहुत तेजी से बच्चे और व्यस्क, शिक्षा संबंधी या रोज़गार संबंधी असफलताओं के चलते अवसाद के शिकार बनते जा रहे हैं और फ़िर इसी अवसाद के चलते वे आत्महत्या करने का निर्णय तक ले लेते हैं, जो बहुत चिंताजनक और दुखदाई है।

आचार्य प्रशांत ने अमर उजाला के इस लेख में बताया है कि जीवन का असली संघर्ष बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि हमारे मन के विकारों से है। उन्होंने समझाया कि हमारा मानव जीवन कीमती है और इसे सही दिशा में ले जाने के लिए हमें अपने मन के विकारों को पहचानना और हटाना जरूरी है। लेख में आचार्य प्रशांत ने कहा कि हमारे मन में उठने वाले क्रोध, लालच, ईर्ष्या, और अन्य नकारात्मक भावनाओं को नियंत्रित करना असली संघर्ष है। उन्होंने जोर दिया कि आत्म-चिंतन और आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से हम अपने भीतर के इन विकारों से मुक्ति पा सकते हैं और सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक जीवन जी सकते हैं।

आचार्य प्रशांत ने अमर उजाला के इस लेख में बताया है कि जीवन में किसी चीज़ से जल्दी प्रभावित होकर पीछे हटने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। उन्होंने समझाया कि जो कार्य हम कर रहे हैं यदि वह स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण है, तो उसे प्राथमिकता देनी चाहिए। लेख में आचार्य प्रशांत ने जोर दिया कि एक सरल और श्रेष्ठतम मन ही सच्चे आध्यात्मिकता को प्राप्त कर सकता है। उन्होंने कहा कि जो लोग भौतिक सुख-सुविधाओं में उलझ जाते हैं, वे सच्चे आध्यात्मिक आनंद से वंचित रह जाते हैं।
News24, in a piece by Acharya Prashant, highlights a lesser-known episode where Gandhi, advised by Gopal Krishna Gokhale to observe India for a year, later led the Champaran movement. This underscores the need for preparation and understanding before major actions, relevant to issues like climate change.

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत महात्मा गांधी की शिक्षा और उनके आदर्शों की आज के समय में प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हैं। वे बताते हैं कि गांधीजी के सिद्धांत और उनके द्वारा स्थापित मूल्य वर्तमान समय में क्यों और कैसे महत्वपूर्ण हैं। लेख में गांधीजी के जीवन के विभिन्न पहलुओं और उनके द्वारा दी गई सीखों को आधुनिक संदर्भ में समझाने का प्रयास किया गया है।

आचार्य प्रशांत ने सनातन धर्म और वेदांत के महत्व पर जोर देते हुए 1 अक्टूबर को "वेदांत दिवस" घोषित किया। भारत एक्सप्रेस के इस लेख में वेदों और उपनिषदों को धर्म का केंद्र मानते हुए उन्होंने कहा कि सनातन धर्म को पुनर्जीवित करने का एकमात्र तरीका उच्चतम ग्रंथों की प्रतिष्ठा है। उन्होंने "घर घर उपनिषद" अभियान शुरू किया है, जिसका उद्देश्य 20 करोड़ घरों तक उपनिषदों को पहुँचाना है। उनका मानना है कि वेदांत की पुनर्प्रतिष्ठा से जीवन का पुनर्प्रतिष्ठा होगा।

राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में, आचार्य प्रशांत ने सही और गलत के निर्णय लेने के महत्व पर प्रकाश डाला है। वे बताते हैं कि आत्म-जागरूकता और आत्म-चिंतन के माध्यम से सही निर्णय लेना महत्वपूर्ण है। सही निर्णय लेना एक कला है, जिसे आत्म-मूल्यांकन से सीखा जा सकता है।

अमर उजाला के इस लेख में, आचार्य प्रशांत ने एआई और चैट जीपीटी की सीमाओं पर चर्चा की है। वे बताते हैं कि एआई मानवीय गुणों जैसे प्रेम, करुणा और आध्यात्मिकता को नहीं समझ सकता।


आचार्य प्रशांत बताते हैं कि हम जन्म से ही दुख में जीते हैं और इसका सही ज्ञान नहीं होता। वे कहते हैं कि अपने दर्द को समझना ही सही मार्ग दिखा सकता है। इस लेख में आत्मज्ञान, संवेदनशीलता, और मन की स्थिरता पर जोर दिया गया है। राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में, यह बताया गया है कि अगर हम अपनी स्थिति का सटीक संज्ञान लें तो हमारी भटकन समाप्त हो सकती है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत आलस्य के कारण मन में उत्पन्न होने वाली उदासीनता और निराशा के बारे में बताते हैं। वे इस बात पर जोर देते हैं कि धन के अभाव में व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाता है, जिससे गुलामी की स्थिति उत्पन्न होती है। आचार्य प्रशांत यह समझाते हैं कि आलस्य से निकलने का एकमात्र उपाय आत्मानुशासन और आत्मसाक्षात्कार है।

दैनिक जागरण के इस लेख में, आचार्य प्रशांत ने हिन्दी भाषा की गिरावट पर चर्चा की है। जापान और जर्मनी की तरह भारत में भी मातृभाषा के प्रति गर्व क्यों नहीं है, इस पर सवाल उठाया गया है। हिन्दी की उपेक्षा और अंग्रेजी के प्रभाव को मुख्य कारण बताया गया है। लेख में, हिन्दी के महत्व और उसकी समृद्धि के लिए जागरूकता फैलाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत लिखते है सनातन धर्म का अर्थ है जो काल की सीमाओं से परे हो, जिसमें निरंतरता हो। जो धर्म समय के अनुसार बदलता रहे, वही सनातन धर्म है। यह आपको हमेशा शांति की ओर अग्रसर करता है। आज का जो व्यावहारिक धर्म है, उसमें बदलाव की आवश्यकता है ताकि सनातन धर्म की मूल भावना को बनाए रखा जा सके। यह धर्म व्यक्ति को मानसिक और आत्मिक मुक्ति की ओर ले जाता है, उसे भय, भ्रम, और अज्ञान से मुक्त करता है, और उसे सच्चे ज्ञान की ओर प्रेरित करता है।

Acharya Prashant delves into Sanatan Dharma's timeless essence, contrasting it with modern Hinduism. He emphasizes Sanatan Dharma's focus on eternal truths and self-knowledge to free individuals from suffering. Acharya Prashant advocates for embracing these principles to foster a liberated, compassionate society.

इस ABP Live साक्षात्कार में, आचार्य प्रशांत बताते हैं कि कैसे हम जीवन के तथ्यों के बावजूद आशा लगाए रखते हैं। वे समझाते हैं कि कैसे नई संभावनाओं की उम्मीद हमें जीवनभर नचाती रहती है, जबकि हमें कम ही मिलता है, लेकिन मिलने की आशा बहुत ज्यादा बनी रहती है। आचार्य प्रशांत का यह दृष्टिकोण हमें आशा और वास्तविकता के बीच के संतुलन को समझने में मदद करता है।

आचार्य प्रशांत ने ABP Live को दिए इंटरव्यू में अपनी IIT और IIM प्रशासनिक सेवाओं को छोड़कर आध्यात्मिकता की ओर मुड़ने के कारणों पर चर्चा की। आचार्य प्रशांत ने आत्मज्ञान के महत्व पर जोर दिया, जिससे उन्हें इस मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिली।

आचार्य प्रशांत राष्ट्रीय सहारा में लिखते है छल को पहचानने के लिए निष्ठुर नजर चाहिए। कपटी व्यक्ति दूसरे कपटी को नहीं पहचान सकता। छल का मतलब है पुरानी जानकारी से मेल न खाना। अगर आपका कुछ बिगड़ता है और दूसरा छल करता है, तो इसका मतलब है कि आपने अपनी शांति खो दी है। जो निर्दोष है, उसका छल कुछ नहीं बिगाड़ सकता। छल-कपट से नुकसान तब होता है जब आप भी कपटी होते हैं। यह खेल है जिसमें हार-जीत चलती रहती है। शरीर और संसार के रिश्ते बनते और टूटते रहते हैं। छल से बचने के लिए इस खेल से बाहर निकलें, फिर कोई नुकसान नहीं होगा।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत लिखते है हर पर्व हमें यह सिखाता है कि हम खुद को बदलें, हरेक पर्व यह अवसर देता है कि हम अपने जीवन को नई दिशा दें। जन्माष्टमी पर हमें श्रीकृष्ण के संदेशों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए। श्रीकृष्ण का संदेश हमें प्रेम, सत्य, और कर्तव्य की राह पर चलने की प्रेरणा देता है। यह पर्व हमें आत्मनिरीक्षण का मौका देता है, जिससे हम अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं।

शिक्षा जीवन का मूल आधार है, जो हमें सही दिशा और दृष्टिकोण प्रदान करती है। दैनिक जागरण के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने शिक्षा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि शिक्षा न केवल जानकारी का संग्रह है, बल्कि यह हमें सोचने, समझने और सही निर्णय लेने की क्षमता भी प्रदान करती है। सही शिक्षा हमें जीवन के हर पहलू में समृद्ध बनाती है और हमें सच्चाई के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है। शिक्षा का सही उपयोग हमें एक बेहतर समाज का निर्माण करने में सक्षम बनाता है।

रक्षाबंधन का सही अर्थ समझाते हुए राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने कहा कि यह केवल भाई-बहन के बीच का पर्व नहीं है। विभिन्न पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में रक्षा के व्यापक अर्थ दिए गए हैं। आज हमें पर्यावरण, भाषा, संस्कृति और समाज की रक्षा की जरूरत है। यह पर्व हमें व्यापक दृष्टिकोण अपनाने और सभी कमजोर एवं जरूरतमंदों की रक्षा करने का संदेश देता है। आचार्य प्रशांत ने कहा कि हमें हर प्रकार की सुरक्षा और संरक्षण के लिए प्रयास करना चाहिए।

आज के समय में अनुभव और श्रेष्ठजनों की शिक्षाओं का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि यदि हम उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाएं, तो हमें सफलता प्राप्त हो सकती है। श्रेष्ठजनों की सीख हमें सही दिशा में मार्गदर्शन करती है और हमारे जीवन को सफल बनाने में सहायक होती है। उनका मार्गदर्शन हमारे व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन को समृद्ध बना सकता है।

आचार्य प्रशांत ने यज्ञ के वास्तविक अर्थ पर चर्चा करते हुए दैनिक जागरण के इस लेख में बताया कि आज के समय में लोग यज्ञ का सही अर्थ नहीं समझते। यज्ञ का मतलब केवल पूजा-पाठ नहीं है, बल्कि यह आत्मिक और आध्यात्मिक शुद्धि का माध्यम है। यदि हम यज्ञ का सही मतलब नहीं जानते, तो इसका सही लाभ भी नहीं उठा सकते। यज्ञ के सही अर्थ को समझना और उसका पालन करना ही सच्ची भक्ति है।

आचार्य प्रशांत ने दैनिक जागरण के इस लेख में बताया कि हमारी परेशानियों का समाधान हमारे स्वयं के भीतर है। यदि हम अपनी वास्तविक समस्या को पहचानें और उसे सही तरीके से समझें, तो हम उसका सही समाधान पा सकते हैं। इधर-उधर भटकने और बाहरी उपायों पर निर्भर रहने के बजाय हमें अपने अंदर झांकने और समस्या के मूल कारण को समझने की आवश्यकता है। सच्ची शांति और समाधान तभी मिल सकता है जब हम अपनी समस्याओं का सामना ईमानदारी से करें।

आचार्य प्रशांत ने राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में शिक्षा व्यवस्था की खामियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह प्रक्रिया सही दिशा में नहीं चल रही है। बच्चों की मानसिक स्थिति का ध्यान रखे बिना उन्हें ज्ञान देने की कोशिश की जा रही है। हमें बच्चों की शिक्षा में स्वाध्याय और आत्मचिंतन को शामिल करना चाहिए। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि बच्चों की शिक्षा केवल जानकारी देने तक सीमित न हो, बल्कि उन्हें सही तरीके से सोचने और समझने के योग्य बनाए।

आचार्य प्रशांत ने असली जवानी का मतलब समझाते हुए राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में कहा कि यह केवल शारीरिक अवस्था नहीं है, बल्कि प्रेम, ऊर्जा, उत्साह और सपनों से भरी एक मानसिक और आत्मिक स्थिति है। असली जवानी तब होती है जब हम सच्चाई की ओर आकर्षित होते हैं और अपने आत्म-ज्ञान को पहचानते हैं। यह अवस्था व्यक्ति को जीवन में गहराई और स्थिरता देती है, जिससे वह अपने जीवन का सच्चा आनंद ले सकता है।

आचार्य प्रशांत ने दैनिक जागरण के इस लेख में बताया कि अध्यात्म एक अंतिम बिंदु का नाम है, जो सामान्य जीवन से बहुत अलग है। यह आत्म-जागरण और सच्ची समझ की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा कि शरीर और इस दुनिया में आना शुभ है, लेकिन असली शांति और खुशी अध्यात्म के माध्यम से ही प्राप्त होती है। अध्यात्म का अर्थ है, अपने सच्चे आत्म को जानना और अपने मूल उद्देश्य को समझना।

आचार्य प्रशांत ने वीगनिज्म के आध्यात्मिक आधार पर जोर देते हुए राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में कहा कि यदि वीगनिज्म सच्चा है, तो यह आत्मिक विकास का हिस्सा होना चाहिए। उन्होंने बताया कि दूसरे जीवों पर अत्याचार न करना और न्यूनतम हिंसा का पालन करना सच्चे वीगनिज्म का मूल है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने शरीर और आत्मा को शुद्ध रख सकता है, जिससे जीवन में सच्ची शांति और संतुष्टि प्राप्त होती है।

IBC24 के इस लेख में आचार्य प्रशांत लिखते है शरीर का जन्म वासना से होता है, और इसे गलत क्यों नहीं माना जाना चाहिए। लेख में तर्क दिया गया है कि आत्मा न तो जन्म लेती है न मरती है, और वासना से उत्पन्न होने वाले शरीर को सही रूप में समझने की आवश्यकता है। आध्यात्मिक दृष्टि से, शरीर को केवल एक वाहन मानना चाहिए, न कि अंतिम सत्य।

आचार्य प्रशांत ने राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में पुनर्जन्म को आत्मिक जागरूकता का प्रतीक बताते हुए कहा कि सच्चा पुनर्जन्म हमारे जीवन में गहराई से आत्म-जागरूकता प्राप्त करने से होता है। उन्होंने बताया कि हमें अपने कर्म, विचार और आत्मिक उद्देश्य पर ध्यान देना चाहिए ताकि हम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सकें।

आचार्य प्रशांत ने राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में जीवन में हौसले के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हर असफलता हमें नया सीखने और फिर से प्रयास करने का मौका देती है। निरंतर प्रयास और आत्मविश्वास हमें जीवन में सफलता दिला सकते हैं। हार को स्वीकार करना और उससे सीखना ही असली हौसला है। यह हमें मानसिक और आत्मिक रूप से मजबूत बनाता है और हमें अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।

इस लेख में बताया गया है कि युवा पीढ़ी को आध्यात्म और भारतीय संस्कृति से जोड़ने की आवश्यकता है। आचार्य प्रशांत ने संस्कृति के अंधानुकरण के बजाय आत्म-साक्षात्कार पर जोर दिया है। प्रकाशित: अमर उजाला, 12 जुलाई 2023।

राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने असली सुंदरता का महत्व बताते हुए कहा कि बाहरी सुंदरता की तुलना में आंतरिक सुंदरता अधिक महत्वपूर्ण है। बाहरी सुंदरता क्षणिक और सतही होती है, जबकि आंतरिक सुंदरता स्थायी और गहरी होती है। सच्ची सुंदरता वह है जो व्यक्ति के विचारों, कार्यों और आत्मा में झलकती है।

दैनिक भास्कर में प्रकाशित लेख के अनुसार ग्रेटर नोएडा में आयोजित 'गीता समागम' श्रृंखला के तीसरे अध्याय 'कर्मयोग' पर आचार्य प्रशांत ने सत्र का संचालन किया। इस सत्र में उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों को सरल और सहज भाषा में प्रस्तुत कर, आम लोगों के जीवन को अर्थपूर्ण और आसान बनाने की दिशा में मार्गदर्शन दिया।
दैनिक भास्कर में प्रकाशित लेख के अनुसार ग्रेटर नोएडा में आयोजित 'गीता समागम' श्रृंखला के तीसरे अध्याय 'कर्मयोग' पर आचार्य प्रशांत ने सत्र का संचालन किया। इस सत्र में उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों को सरल और सहज भाषा में प्रस्तुत कर, आम लोगों के जीवन को अर्थपूर्ण और आसान बनाने की दिशा में मार्गदर्शन दिया।

आचार्य प्रशांत ने भाषा के महत्व पर जोर देते हुए राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में कहा कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन में उपयोगिता के आधार पर ही जीवंत रहती है। उन्होंने बताया कि भाषा की सही शिक्षा हमें आत्मनिर्भर और सक्षम बनाती है। सही तरीके से भाषा का प्रयोग करने से रोजगार और सामाजिक स्तर पर बेहतरी मिलती है। आचार्य प्रशांत ने विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से यह समझाया कि भाषा की वास्तविक उपयोगिता कैसे जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकती है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने जीवन में अपने लक्ष्यों को स्वयं निर्धारित करने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि दूसरों के लक्ष्यों की नकल करने से सफलता नहीं मिलती। असली सफलता तभी प्राप्त होती है जब लक्ष्य खुद तय किया जाए और उस पर ईमानदारी से काम किया जाए। अपनी पहचान और रुचियों के अनुसार लक्ष्य निर्धारण करना जीवन को सही दिशा देता है और सफलता की संभावनाएं बढ़ाता है।

आचार्य प्रशांत ने ग्रेटर नोएडा में संत सरिता श्रृंखला के दौरान बताया कि जीवन में बदलाव के लिए आत्मनिर्भरता आवश्यक है। राष्ट्रीय सहारा के अनुसार, उन्होंने कहा कि बाहरी स्थितियों को दोष देने के बजाय व्यक्ति को खुद जिम्मेदारी उठानी चाहिए।

राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने समाज में धर्म-परिवर्तन पर हो रहे विवाद पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि धर्म-परिवर्तन का फैसला आर्थिक या शारीरिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और सच्चे धर्म की खोज में होना चाहिए। सच्चा धर्म प्रेम, करुणा और आत्मज्ञान पर आधारित होता है। धर्म-परिवर्तन का निर्णय सोच-समझ कर और आत्म-विश्लेषण के बाद ही लेना चाहिए। आचार्य प्रशांत ने बताया कि बाहरी दिखावे या लाभ के लिए धर्म बदलना आत्मिक विकास में बाधा उत्पन्न कर सकता है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने खेल और जीवन के मैदान में जीत और हार के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि असली उद्देश्य सिर्फ जीतना नहीं, बल्कि अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना है। हर प्रदर्शन हमें पहले से बेहतर बनाता है, और इसमें हार का भी महत्व है। आचार्य प्रशांत के अनुसार, सही दृष्टिकोण से जीत और हार दोनों से सीखा जा सकता है, जिससे जीवन में संतुलन और स्थिरता आती है। जीवन को खेल की तरह अपनाकर ही हम असली सफलता पा सकते हैं।

दैनिक जागरण के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने आधुनिकता और विकास में सिर्फ आर्थिक पहलुओं पर जोर देने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि विकास को आर्थिक आंकड़ों तक सीमित करना पर्याप्त नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य, और सामाजिक प्रगति जैसे मानकों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। भारत में गरीबी की स्थिति और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी को देखते हुए व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। आर्थिक विकास के साथ-साथ समग्र विकास की दिशा में काम करना आवश्यक है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने प्रतियोगी परीक्षाओं में असफलता से निराश न होने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि जीवन में कई बार असफलता एक बड़ी सफलता का आधार बनती है। असफलता से निराश होकर रुकने के बजाय उससे सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने बताया कि निरंतर प्रयास और आत्म-विश्लेषण से ही वास्तविक सफलता प्राप्त की जा सकती है। असफलता को एक सीख के रूप में स्वीकारें और उससे प्रेरणा लेकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ें।

IBC24 में प्रकाशित लेख में आचार्य प्रशांत ने कहा कि जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य अपनी मुक्ति और जगत का कल्याण है। अपनी मुक्ति के लिए आत्मज्ञान आवश्यक है, जिसे उपनिषदों और संतवाणी से प्राप्त किया जा सकता है। ग्रेटर नोएडा में जीएन ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट में आयोजित दो दिवसीय संत समागम में उन्होंने यह बातें साझा कीं। उन्होंने आत्मा से दूरी को दुख का मुख्य कारण बताया और गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला।

दैनिक भास्कर में प्रकाशित लेख के अनुसार आचार्य प्रशांत को IIT दिल्ली एलुमनी अवार्ड से सम्मानित किया गया है। एसोसिएशन के सचिव ने कहा कि आचार्य हमेशा से IIT दिल्ली परिसर की गरिमा बढ़ाते रहे हैं। यह अवार्ड उनके द्वारा किए गए उत्कृष्ट कार्यों और संस्थान के प्रति उनके योगदान को मान्यता देता है। आचार्य प्रशांत का यह सम्मान प्रेरणा का स्रोत है, जो छात्रों और एलुमनी को उनके आदर्शों का पालन करने के लिए प्रेरित करता है।

प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक और पूर्व सिविल सेवा अधिकारी आचार्य प्रशांत ने दैनिक भास्कर में प्रकाशित लेख के अनुसार कहा कि जीवन में करने योग्य एक ही काम है, अपनी मुक्ति और जगत का कल्याण। अपनी मुक्ति के लिए आत्मज्ञान जरूरी है। उसके लिए हमें उपनिषदों के पास आने होगा। सामान्यजन के लिए उपनिषदों का व्यवहारिक ज्ञान हमें संतवाणी से ही मिल सकता है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने मानव जीवन में कर्म के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि हमारे कर्म ही जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। घर-परिवार से लेकर दुनियादारी निभाने तक, हर पहलू में कर्म की अहमियत है। उन्होंने बताया कि सही कर्म करने से ही मनुष्य सच्चे अर्थों में मानवता का पालन कर सकता है। जीवन में कर्म और मनुष्यता का गहरा संबंध है, जो हमारे भविष्य को आकार देता है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने कहा कि अपने जीवन की जिम्मेदारियों को समझना और उन्हें पूरी तरह निभाना सफलता की कुंजी है। हर कार्य की जिम्मेदारी स्वयं लेने से व्यक्ति अपने जीवन में सुधार कर सकता है। उन्होंने बताया कि आत्मनिर्भरता और स्वयं की जिम्मेदारी उठाना जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है। अपनी जिम्मेदारियों को स्वीकार करना और उनका पालन करना ही सच्ची सफलता का मार्ग है।

स्पीकिंग ट्री के इस लेख में इला गोस्वामी आचार्य प्रशांत की पुस्तक 'माया' पर लिखती हैं। वे बताती हैं कि अक्सर हम सभी मनुष्यों के चित्त में उठने वाले सवाल एक जैसे ही होते हैं क्योंकि हम सभी आसपास जो महसूस कर रहे हैं, जिन चीज़ों के साथ हमारा तालमेल है और जिस सोच के साथ हम आगे बढ़ रहें हैं, वह सभी एक ही फैक्टर से प्रभावित होता है, वह है ‘माया’।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि सकारात्मक सोच और प्रेरणा से जीवन की कठिनाइयों को आसानी से हल किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि हमारी सोच का प्रभाव हमारे कार्यों और परिणामों पर पड़ता है। हर स्थिति में प्रेरित और सकारात्मक रहने से हम अपनी क्षमताओं को पहचानते हैं और अपने लक्ष्यों को हासिल कर सकते हैं।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि खुद को बेसहारा समझने की बजाय आत्मविश्वास के साथ सिर उठा कर जीना सीखें। आत्मनिर्भरता से जीवन में आने वाली हर चुनौती का सामना किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अपनी कमजोरियों को पहचानकर उन्हें अपनी ताकत बनाएं। सही दृष्टिकोण और मेहनत से कोई भी कमजोरी ताकत में बदल सकती है। यह लेख बताता है कि आत्म-विश्वास और संकल्प शक्ति से कैसे हर मुश्किल को पार किया जा सकता है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि भारतीय संस्कृति में गुरु का दर्जा भगवान के समान माना जाता है। गुरु हमें सही संस्कारों की राह पर चलने की शिक्षा देकर हमारा मार्ग प्रशस्त करते हैं। एक सच्चा गुरु पथ-प्रदर्शक की तरह होता है, जो हमारे जीवन को सही दिशा में ले जाने में मदद करता है। गुरु का महत्व इसलिए भी है क्योंकि वे हमें आत्मिक ज्ञान और जीवन के सही मूल्य सिखाते हैं, जिससे हम जीवन में सफल और संतुष्ट हो सकें।

Acharya Prashant emphasizes that true success lies in making the right choices rather than simply achieving goals. He highlights the importance of aligning decisions with one's core self and inner needs, asserting that victory is found in the act of choosing the right path itself, rather than in the attainment of external outcomes.

राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने धर्म-परिवर्तन पर हो रहे विवाद पर कहा कि यह आत्मिक शांति और सच्चे धर्म की खोज में होना चाहिए, न कि आर्थिक या शारीरिक लाभ के लिए। उन्होंने समझाया कि बाहरी दिखावे या लाभ के लिए धर्म बदलना आत्मिक विकास में बाधा उत्पन्न कर सकता है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि आरामपरस्त जीवनशैली को त्यागकर जिम्मेदारियों का बोझ उठाना आवश्यक है। जब तक आप जिम्मेदार नहीं बनेंगे, तब तक जीवन के दौड़ में पीछे ही रह जाएंगे। उन्होंने समझाया कि आत्मनिर्भरता और जिम्मेदारी निभाने से ही व्यक्ति जीवन में सफलता और संतुष्टि पा सकता है। अपनी जिम्मेदारियों को निभाना सच्चे आत्मसम्मान और आत्मविकास का मार्ग है।

राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया पर विचार करते हुए बताया कि ये प्रकृति के खेल हैं, जिसमें कोई बदलाव नहीं होता। उन्होंने कहा कि आत्मा की सही खोज प्रकृति में नहीं, बल्कि आत्मज्ञान में है। बाहरी दुनिया में सत्य की खोज करने से व्यक्ति निराशा पाता है, जबकि आत्मज्ञान से ही सच्चे सुख और शांति की प्राप्ति होती है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि जीवन में सफल होने के लिए लक्ष्य निर्धारित करना आवश्यक है, लेकिन उसे प्राप्त करने के लिए मशीन की तरह काम करना नहीं, बल्कि रचनात्मक सोच को अपनाना जरूरी है। उन्होंने समझाया कि मनुष्य केवल भौतिक कार्यों का निष्पादन करने वाला यंत्र नहीं है, बल्कि उसमें आत्मिक और रचनात्मक क्षमताएं भी हैं। सही दृष्टिकोण और रचनात्मकता से ही जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है।

In an address at a Rishikesh workshop, Acharya Prashant emphasized that spirituality is the only way to overcome sorrow. He discussed the importance of accepting sadness to gradually alleviate it and highlighted the necessity of recognizing the value of time and living with clarity to achieve liberation. Acharya Prashant stressed that spirituality should be a primary goal for a fulfilled life.

Acharya Prashant emphasizes that liberation is the ultimate aim of life. He argues that true freedom and fulfillment come from aligning with one's inner self and living a life of spiritual clarity. Acharya Prashant advocates for the integration of spiritual practices into daily life, viewing them as essential for overcoming life's turmoil and achieving lasting peace and contentment (Garhwal Post) (Garhwal Post).

अमर उजाला में प्रकाशित लेख के अनुसार ऋषिकेश में प्रशांत अद्वैत संस्था के संस्थापक आचार्य प्रशांत ने दो दिवसीय कार्यशाला में समय के वैज्ञानिक महत्व पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि विचार और समय के बीच का संबंध साफ देखना होगा, तब ही हम जीवन के सबसे बहुमूल्य संसाधन समय का सम्यक उपयोग कर पाएंगे।

हिंदुस्तान न्यूज़ में प्रकाशित लेख के अनुसार प्रशांत अद्वैत संस्था के संस्थापक आचार्य प्रशांत ने ऋषिकेश में आयोजित कार्यक्रम में समय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि समय दुनिया में सबसे मूल्यवान है। प्रकृति बदलती है और समय के हिसाब से जीवन में बदलाव अनिवार्य है।

Acharya Prashant challenges the self-help illusion in The Pioneer, asserting true spirituality begins when the ego accepts it needs no aid, and transformation occurs by relinquishing ego control.



राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि ध्यान में अपने-आप में कुछ भी नहीं है। ध्यान को जब भी कुछ बनाया जाएगा, तो ध्यान के साथ दुर्व्यवहार हो जाएगा। हमारा स्वभाव है ध्यान। ध्यान कोई क्रिया नहीं है। ध्यान का मतलब होता है कि कोशिश किए बिना, मन एकाग्रता की स्थिति में हो। ध्यान केवल आत्मसाक्षात्कार की स्थिति है, जिसमें मन का आत्मा से गहरा संबंध हो जाता है। ध्यान एक ऐसी स्थिति है, जिसमें मन बिना किसी प्रयास के, अपनी स्वाभाविक स्थिति में स्थिर हो जाता है।

अमर उजाला में प्रकाशित आचार्य प्रशांत के इस लेख में जीवन में लक्ष्य निर्धारित करने और उन्हें प्राप्त करने की संकल्प शक्ति पर जोर दिया गया है। वह बताते हैं कि संकल्प शक्ति से व्यक्ति अपने प्रयासों को सही दिशा में केंद्रित कर सकता है, जिससे सफलता के द्वार खुलते हैं। इस लेख में उन्होंने संकल्प शक्ति को मजबूत करने के तरीकों पर चर्चा की है और बताया है कि कैसे संकल्प शक्ति से जीवन में सकारात्मक बदलाव लाए जा सकते हैं।

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत लिखते हैं त्याग का मतलब है जो कुछ है, उसे पहचान कर उसका त्याग कर देना। सही मायनों में त्याग तिरस्कार नहीं है, वह हमारी जरूरतों से जुड़ा है। भारत में गलत तरीके से त्याग की अवधारणा को समझा गया है। त्याग केवल खाने-पीने का नहीं बल्कि अपने अंदर की गलत सोच और आदतों का भी त्याग करना है। त्याग का सही मतलब तभी समझ में आता है जब हम जीवन के प्रति अपनी सोच को बदलते हैं और सही दिशा में आगे बढ़ते हैं।

अमर उजाला में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत लिखते हैं अपना भला-बुरा सोचने-समझने की शक्ति आपको धीरे-धीरे हर हालात से लड़ना सिखा देती है और इस काबिल बना देती है कि आप दूसरों की परछाई से निकलकर अपने जीवन के अहम निर्णय खुद ले सकें। खुद पर दूसरों की सोच हावी नहीं होने दें और अपनी विचारधारा को स्पष्ट रखें। आलोचनाओं से प्रभावित हुए बिना अपने उद्देश्य की ओर आगे बढ़ें। अपनी ताकत और कमजोरियों को पहचानकर जीवन में आत्मनिर्भर बनें। आत्मनिर्भरता ही आपकी सच्ची शक्ति है।

सत्य दो धातुओं से मिलकर बना है सत् और तत्। सत का अर्थ यह और तत का अर्थ वह। दोनों ही सत्य है। अहं ब्रह्मा अस्मि और तत्वमसि, अर्थात मैं ही ब्रह्म हूँ और तुम ही ब्रह्म हो। यह संपूर्ण जगत ब्रह्ममय है। ब्रह्म पूर्ण है।


अमर उजाला में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि जीवन में हार और जीत के अनुभव कैसे हमारी मानसिकता और जीवन दृष्टिकोण को प्रभावित करते हैं। वह उदाहरण देते हैं कि कैसे इतिहास के कई महान व्यक्तियों ने अपनी हार से सीखा और आगे बढ़े। उनके विचार में, सच्ची जीत वही है जो हमारी आत्मा को मजबूती और मन को शांति प्रदान करे, चाहे परिणाम कुछ भी हो। यह लेख प्रेरणा देता है कि हम हर परिस्थिति में धैर्य और साहस के साथ खड़े रहें।

दैनिक जागरण के इस लेख में आचार्य प्रशांत की पुस्तक "मुक्ति" की समीक्षा की गई है। यह पुस्तक व्यक्ति को बाहरी और आंतरिक बाधाओं से मुक्ति दिलाने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करती है। इसमें आत्मज्ञान, आत्मनिरीक्षण, और मानव जीवन के गहन अर्थों पर विस्तृत चर्चा की गई है। आचार्य प्रशांत ने सरल भाषा में गूढ़ विषयों को समझाया है, जो हर व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिक उत्थान ला सकती है।

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि जब तक व्यक्ति दुनिया के सामने रहता है, तब तक वह अपने वास्तविक स्व को नहीं देख पाता। ध्यान का अभ्यास करने से व्यक्ति अपने मन की गहराइयों में उतर सकता है और सच्ची आत्म-प्राप्ति कर सकता है। ध्यान से मन शांत होता है और आत्म-जागरूकता बढ़ती है, जिससे जीवन में शांति और संतुलन आता है। अकेलेपन को आत्मनिरीक्षण का अवसर मानकर अपनाएं, जिससे सच्चे आत्मबोध का अनुभव किया जा सके।

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि चेतना का हर स्तर हमें खुद के अधिक करीब लाता है। जागृत अवस्था में हम पूरी तरह से सतर्क रहते हैं, सुप्ति में कुछ हद तक अनभिज्ञ, और तुरीय में हम अपने शुद्धतम स्वरूप में होते हैं। यह यात्रा हमें हमारे भीतर की सच्चाई से अवगत कराती है, जिससे जीवन में सच्ची शांति और आनंद का अनुभव होता है।

अध्यात्म ज्ञान के माध्यम से शिक्षा को स्कूल-कॉलेज की किताबों से परे तक ले जाता है। अमर उजाला में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत ने समझाया कि शिक्षा का उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना नहीं है, बल्कि जीवन की गहरी समझ और सार्थकता को बढ़ाना भी है। अध्यात्मिक शिक्षा मनुष्य को आत्म-ज्ञान और सही दिशा की ओर मार्गदर्शित करती है, जिससे जीवन में वास्तविक पूर्णता और संतुलन प्राप्त होता है।

आचार्य प्रशांत द्वारा लोकदेश में लिखा यह लेख शिवलिंग की पूजा के पीछे के आध्यात्मिक महत्व को स्पष्ट करता है। शिवलिंग चेतना का प्रतीक है। वे बताते हैं कि शिवलिंग की पूजा न केवल पौराणिक कथाओं में बल्कि हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं में भी गहरी अर्थवत्ता रखती है। शिवलिंग को चेतना और सृजनात्मक शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

"PETA recently gave Acharya Prashant the “Most Influential Vegan” award. In 2025, his foundation got an award for being the Best Animal Welfare Organisation for helping people live a more compassionate life and reducing the suffering of animals. He has spoken at more than 200 universities and colleges, including premier institutions like IITs, IIMs, AIIMS, BITS, and the University of California. In these sessions, he frequently asks students to look at not just the environmental impact of their food and lifestyle choices, but also the effect that they have on their own inner conditioning."

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि द्वैत में जीने के लिए अद्वैत को भूलना जरूरी है। जब तक याद है, तब तक द्वैत है। अद्वैत से जुड़ा कोई अनुभव नहीं हो सकता, खासकर जब आत्मा के मुख से निकलता हो। राजा और बंदर की कहानी के माध्यम से वे समझाते हैं कि जब तक द्वैत है, तब तक चंचलता बनी रहती है। अद्वैत में सबकुछ शांत हो जाता है।

अमर उजाला में प्रकाशित आचार्य प्रशांत का यह लेख आध्यात्मिक ग्रंथों की महत्वपूर्णता पर प्रकाश डालता है। वे बताते हैं कि जीवन की समस्याओं का समाधान और आत्मिक शांति पाने के लिए ग्रंथों का अध्ययन कैसे सहायक हो सकता है। इस लेख में आचार्य ने ग्रंथों के अध्ययन की महत्ता और उनके जीवन में योगदान पर विस्तृत चर्चा की है।

दैनिक जागरण के इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि प्रेमी वही कर रहा है, जो गुरु का काम है। तुम्हारे सभी संस्कारों को तुम्हें मुक्त कर रहा है। और जो ये ना करे, उसका प्रेमी बना मत लेना। प्रेम किसी की गुलामी करने का नाम नहीं है, बल्कि यह तुम्हें आत्मनिर्भर बनाता है। जब तुम किसी से प्रेम करते हो, तो तुम उसे उसकी अच्छाइयों और कमियों के साथ स्वीकार करते हो। यही सच्चा प्रेम है, जो तुम्हें सच्चाई और साहस के साथ जीना सिखाता है।

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि वेदांत की मूल बातें समझें: "सत्य एक है," जो अपनी लीलाओं, मुक्तियों, और स्वेच्छाओं में अनेक रूपों में अभिव्यक्त होता है। वेदांत के अनुसार, अभिव्यक्त होना सत्य का स्वभाव है। अर्जुन की तरह हमें अपने भीतर की त्रिगुणात्मकता को पहचानना चाहिए और उसके पार जाना चाहिए। जब तक हम अपने मन को नियंत्रित नहीं करते, तब तक विवेक नहीं प्राप्त कर सकते।

अमर उजाला में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं मन चंचल जरूर होता है लेकिन इसकी चंचलता पर अगर आपने विजय पा ली तो यकीन मानें अपनी दुल्हना पर विजय पा ली। मन को सही दिशा में नियंत्रित करने के लिए अनुशासन और सतत अभ्यास आवश्यक हैं। जीवन में सच्चे लक्ष्य का निर्धारण करके, मानसिक शांति और सशक्तिकरण प्राप्त किया जा सकता है।

अमर उजाला में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं समस्याओं से डटकर सामना करना सीखो। इन समस्याओं से जब तक भिड़ोगे नहीं, तब तक अपनी ताकत का एहसास भी नहीं कर पाओगे और न ही जीवन में आगे बढ़ पाओगे।

राष्ट्रीय हिंदी मेल के इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि हमें सबसे कठिन काम को प्राथमिकता देनी चाहिए। कठिनाइयों का सामना करने से आत्म-विकास और दृढ़ता का निर्माण होता है। समस्याओं से निपटते समय हमें धैर्य, आत्म-संयम, और निरंतर प्रयास की आवश्यकता होती है। इस प्रक्रिया में अन्य कार्य भी सहजता से पूर्ण हो जाते हैं।

आचार्य प्रशांत के अनुसार प्रेम और मृत्यु साथ-साथ चलते हैं, जो जीवन के अमर पहलू हैं। राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस लेख में आचार्य बताते हैं प्रेम का सच्चा अर्थ है परम आनंद प्राप्त करना, जिसमें भौतिकता और आसक्ति का कोई स्थान नहीं। सच्चे प्रेम को समझने और आत्मसात करने के लिए हमें स्वयं को संकीर्णता और भ्रम से मुक्त करना होगा।

Delve into Acharya Prashant's illuminating perspective on consumption and inner peace in The Pioneer. As a renowned Vedanta teacher, he advocates for mindful consumption, urging readers to align their consumption habits with personal well-being and environmental sustainability.