Coverage of his work in the national and international press: his gatherings, dialogues, recognitions, and milestones.

Renowned philosopher and bestselling author Acharya Prashant returned to India on Sunday after presenting eloquently on Indian philosophy, Vedanta and Upanishads at renowned global forums like Oxford University, Cambridge University and the UK Parliament. A large crowd gathered at Indira Gandhi International Airport to greet him with the tricolor, welcome messages, and congratulatory letters.

Nearly 145 years after Max Muller carried the Isha Upanishad to Oxford as a scholarly object, Acharya Prashant returned it to the same university as a living teaching — arguing, in the very building where economics and policy are taught, that no external solution can resolve humanity's crises without first examining the consuming ego that drives them.
दैनिक भास्कर में प्रकाशित लेख के अनुसार ग्रेटर नोएडा में आयोजित 'गीता समागम' श्रृंखला के तीसरे अध्याय 'कर्मयोग' पर आचार्य प्रशांत ने सत्र का संचालन किया। इस सत्र में उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों को सरल और सहज भाषा में प्रस्तुत कर, आम लोगों के जीवन को अर्थपूर्ण और आसान बनाने की दिशा में मार्गदर्शन दिया।

Philosopher Acharya Prashant returned to India on Sunday after a landmark leg of his United Kingdom tour that took him to the platforms of Oxford University, Cambridge and the UK Parliament, where he placed the teachings of Vedanta and Indian Philosophy at the centre of global discourse on some of the defining questions of our times.

In 1879, Professor Max Muller carried the Ishavasya Upanishad to the West, publishing its first English translation through Oxford University Press as the opening volume of the 'Sacred Books of the East'. Nearly a century and a half later, an Indian philosopher has arrived at the same university to return the text to its living meaning.
FOR THE PRESS

A special dialogue session with Acharya Prashant — a Vedanta scholar and author — was organized on Sunday at the Indradhanush Auditorium in Sector-5. This event was held for the first time in Panchkula, drawing a large number of participants. Approximately 2,000 people attended in person, while more than 100,000 viewers watched online. Every seat in the auditorium was occupied, and additional space had to be arranged for the overflow.

आचार्य प्रशांत ने कहा कि अकेलेपन से हमें डर इसलिए लगता है क्योंकि हमें जो कुछ भी मिला हुआ है वो दूसरों से ही मिला हुआ है। हमने आपने-आपको कभी जाना नहीं

Addressing a massive gathering of over 100,000 online and on-ground attendees at the Indradhanush Auditorium, Acharya Prashant delivered a powerful message on societal conditioning. Commenting on recent media controversies, he urged society to transcend the archaic mindset that reduces women to objects, calling for systemic introspection into how gender roles alter behavior and language.

"The decision to depart, when genuine, must be the person’s own, arrived at in full awareness, not extracted by family exhaustion, economic pressure, or a system that has run out of ideas. It cannot come from pain alone, because suffering without self-knowledge produces desperation rather than clarity, and desperation and dignity are not on the same register."
"आधुनिक जीवन की उलझनों और वैश्विक संकटों के बीच वेदांत की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए प्रख्यात दार्शनिक, वेदांत मर्मज्ञ और लेखक आचार्य प्रशांत ने भोपाल में दो विशिष्ट आयोजनों को संबोधित किया। ये आयोजन पीवीआर आइनॉक्स और मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान में प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के तत्वावधान में संपन्न हुए। विषय रहे, आत्मबोध, भगवद्गीता, जलवायु परिवर्तन, महिला सशक्तिकरण और आधुनिक जीवन की चुनौतियां। आचार्य प्रशांत ने जलवायु परिवर्तन पर आज की भोगवादी संस्कृति की तीव्र आलोचना की और कहा, “क्लाइमेट चेंज का असली कारण हमारी असंयमित इच्छाएं हैं। और इसका समाधान मात्र आत्मज्ञान है।”
The Jagran article highlights insights from mental health experts on World Mental Health Day, focusing on the issue of "fake depression." Acharya Prashant argues that this phenomenon can be more harmful than genuine depression, as it often trivializes real mental health struggles and can lead to misunderstandings about the nature of depression. He emphasizes the importance of authentic experiences and encourages individuals to seek true understanding and support for mental health issues.

यह लेख दैनिक जागरण में आचार्य प्रशांत की गीता की व्याख्या को प्रस्तुत करता है, जिसमें वे बताते हैं कि गीता का होना कृष्ण का होना है, और गीता को सुनने वाला अर्जुन है। आचार्य प्रशांत कहते हैं कि जिनके पास गीता नहीं है, वे कृष्ण के विरोधी हैं। केवल गीता की प्रति होने से कुछ नहीं होता, सच्चा प्रेम और समझ होना चाहिए। गीता के प्रति वास्तविक जिज्ञासा और बोध के बिना उसकी पूजा या पाठ का कोई लाभ नहीं।

दैनिक जागरण के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने व्यक्त किया है कि जो आदमी सहस के साथ एक सही लक्ष्य और सही काम की खोज कर लेता है, वह आदमी फिर बहुत मुश्किल से रुकता है।

आचार्य प्रशांत ने दैनिक जागरण में इज़राइल-हमास युद्ध पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि युद्ध का कारण यह है कि जब हर व्यक्ति अपनी मान्यता और विश्वास पर अडिग रहेगा, तो संघर्ष होना स्वाभाविक है। वे बताते हैं कि जब लोग अपनी-अपनी मान्यताओं और विचारधाराओं पर जोर देते हैं और किसी भी समझौते या सहमति के लिए तैयार नहीं होते, तो टकराव और संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है।

दैनिक जागरण के इस लेख में, आचार्य प्रशांत ने हिन्दी भाषा की गिरावट पर चर्चा की है। जापान और जर्मनी की तरह भारत में भी मातृभाषा के प्रति गर्व क्यों नहीं है, इस पर सवाल उठाया गया है। हिन्दी की उपेक्षा और अंग्रेजी के प्रभाव को मुख्य कारण बताया गया है। लेख में, हिन्दी के महत्व और उसकी समृद्धि के लिए जागरूकता फैलाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

शिक्षा जीवन का मूल आधार है, जो हमें सही दिशा और दृष्टिकोण प्रदान करती है। दैनिक जागरण के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने शिक्षा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि शिक्षा न केवल जानकारी का संग्रह है, बल्कि यह हमें सोचने, समझने और सही निर्णय लेने की क्षमता भी प्रदान करती है। सही शिक्षा हमें जीवन के हर पहलू में समृद्ध बनाती है और हमें सच्चाई के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है। शिक्षा का सही उपयोग हमें एक बेहतर समाज का निर्माण करने में सक्षम बनाता है।

दैनिक जागरण के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने आधुनिकता और विकास में सिर्फ आर्थिक पहलुओं पर जोर देने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि विकास को आर्थिक आंकड़ों तक सीमित करना पर्याप्त नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य, और सामाजिक प्रगति जैसे मानकों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। भारत में गरीबी की स्थिति और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी को देखते हुए व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। आर्थिक विकास के साथ-साथ समग्र विकास की दिशा में काम करना आवश्यक है।

दैनिक जागरण के इस लेख में आचार्य प्रशांत की पुस्तक "मुक्ति" की समीक्षा की गई है। यह पुस्तक व्यक्ति को बाहरी और आंतरिक बाधाओं से मुक्ति दिलाने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करती है। इसमें आत्मज्ञान, आत्मनिरीक्षण, और मानव जीवन के गहन अर्थों पर विस्तृत चर्चा की गई है। आचार्य प्रशांत ने सरल भाषा में गूढ़ विषयों को समझाया है, जो हर व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिक उत्थान ला सकती है।

दैनिक जागरण के इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि प्रेमी वही कर रहा है, जो गुरु का काम है। तुम्हारे सभी संस्कारों को तुम्हें मुक्त कर रहा है। और जो ये ना करे, उसका प्रेमी बना मत लेना। प्रेम किसी की गुलामी करने का नाम नहीं है, बल्कि यह तुम्हें आत्मनिर्भर बनाता है। जब तुम किसी से प्रेम करते हो, तो तुम उसे उसकी अच्छाइयों और कमियों के साथ स्वीकार करते हो। यही सच्चा प्रेम है, जो तुम्हें सच्चाई और साहस के साथ जीना सिखाता है।

दैनिक जागरण के इस लेख में आचार्य प्रशांत की शिक्षाओं पर आधारित जीवन के गहरे अर्थ का रहस्य उजागर किया गया है। जानें कैसे आत्म-ज्ञान और स्वाभाविकता से जीवन बदल सकता है! पढ़ें और खोजें।

"जागरण" अखबार में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत ने धर्म परिवर्तन के पीछे के लालच और वास्तविक कारणों पर प्रकाश डाला है। उन्होंने डॉ. अंबेडकर और उनके अनुयायियों के उदाहरण से यह समझाने की कोशिश की है कि धर्म परिवर्तन केवल सतही बदलाव नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे सामाजिक और व्यक्तिगत कारण होते हैं। लेख धर्म परिवर्तन के गहन पहलुओं पर विचार करने की आवश्यकता पर जोर देता है।

जागरण - जीवन मंत्र: आचार्य प्रशांत के अनुसार, व्यक्ति के जीवन को संवारने और बिगाड़ने में दो चीजें महत्वपूर्ण होती हैं। घर और दफ्तर में बिताया गया समय व्यक्ति की सोच और व्यवहार को प्रभावित करता है। सही संगति और वातावरण का चयन करना आवश्यक है, क्योंकि ये जीवन संवारने में मदद कर सकते हैं।


आचार्य प्रशांत ने "जागरण" में कहा कि अपनी कहानी खुद लिखने का संकल्प लेना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि जीवन की दिशा हमें खुद निर्धारित करनी चाहिए, न कि परिस्थितियों पर निर्भर रहना चाहिए। आचार्य प्रशांत ने जोर दिया कि आत्म-ज्ञान और सत्य की राह पर चलकर ही हम अपने जीवन की वास्तविक कहानी लिख सकते हैं।

जागरण - आचार्य प्रशांत के अनुसार, जन्माष्टमी को श्री कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाने के बजाय, इसे आत्म-निरीक्षण का अवसर माना जाना चाहिए। वे बताते हैं कि श्री कृष्ण का सन्देश जन्म और मृत्यु की सीमाओं से परे है। इस दिन, हमें अपने बंधनों से मुक्त होकर ठहरना चाहिए और अपनी आंतरिक शक्ति की ओर देखना चाहिए, जो कि स्वयं कृष्ण का रूप है। आचार्य प्रशांत युवा पीढ़ी को अध्यात्म की सही राह दिखाते हैं।

"आचार्य प्रशांत ने केसीसी कॉलेज में वेदांत महोत्सव के दौरान महाभारत से जीवन के संघर्ष का महत्वपूर्ण संदेश साझा किया। उन्होंने कहा कि इस महाकाव्य में संघर्ष की शुरुआत से अंत तक की कहानी है, जो हमें सिखाती है कि हालात चाहे कितने भी कठिन हों, हार नहीं माननी चाहिए। महाभारत के पात्रों के फैसले लेने के तरीकों से यह भी स्पष्ट होता है कि आत्मनिर्भरता और सही निर्णय लेना कितना आवश्यक है। — जागरण"

अद्वैत महोत्सव में तीन दिन के दौरान उपनिषदों और अद्वैत वेदांत पर विशेष प्रवचन हुए। जागरण के अनुसार, स्वामी जी ने साधकों को उपनिषदों की गूढ़ शिक्षाओं को सरलता से समझाया, जिससे आत्मज्ञान प्राप्त करने में मदद मिली। इस आयोजन में ध्यान, भजन, और विचार गोष्ठियों का भी समावेश था, जिससे प्रतिभागियों को आध्यात्मिक अनुभव मिला।

जागरण के अनुसार, अचार्य प्रशांत ने कहा कि आत्मा को प्रकट होने से रोकना आत्महत्या के समान है। उन्होंने बताया कि आत्मबोध और आत्मज्ञान से ही व्यक्ति जीवन में सच्ची शांति और आनंद प्राप्त कर सकता है।


जागरण के अनुसार, अचार्य प्रशांत की पुस्तक 'संबंध' जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और नारीवाद पर गहन चर्चा करती है। उन्होंने रिश्तों में संतुलन और समझ की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला है। उनकी शिक्षाओं ने व्यक्तिगत और सामाजिक संबंधों को नई दिशा दी है।

जागरण के अनुसार, अचार्य प्रशांत ने मूर्ति पूजा के वास्तविक रहस्य को उजागर किया। उन्होंने समझाया कि इसका उद्देश्य आत्मबोध और आंतरिक शांति प्राप्त करना है। बाहरी प्रतीकों की बजाय आंतरिक अनुभव पर जोर दिया।

जागरण के अनुसार, अचार्य प्रशांत ने कहा कि भले ही शरीर संक्रमित हो जाए, मन को संक्रमित न होने दें। उन्होंने मानसिक शांति और आत्मबोध के माध्यम से आंतरिक शक्ति को मजबूत बनाने पर जोर दिया। उनकी शिक्षाएँ कठिन समय में भी मन की स्थिरता बनाए रखने में मदद करती हैं।

