Coverage of his work in the national and international press: his gatherings, dialogues, recognitions, and milestones.

Renowned philosopher and bestselling author Acharya Prashant returned to India on Sunday after presenting eloquently on Indian philosophy, Vedanta and Upanishads at renowned global forums like Oxford University, Cambridge University and the UK Parliament. A large crowd gathered at Indira Gandhi International Airport to greet him with the tricolor, welcome messages, and congratulatory letters.

Nearly 145 years after Max Muller carried the Isha Upanishad to Oxford as a scholarly object, Acharya Prashant returned it to the same university as a living teaching — arguing, in the very building where economics and policy are taught, that no external solution can resolve humanity's crises without first examining the consuming ego that drives them.
दैनिक भास्कर में प्रकाशित लेख के अनुसार ग्रेटर नोएडा में आयोजित 'गीता समागम' श्रृंखला के तीसरे अध्याय 'कर्मयोग' पर आचार्य प्रशांत ने सत्र का संचालन किया। इस सत्र में उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों को सरल और सहज भाषा में प्रस्तुत कर, आम लोगों के जीवन को अर्थपूर्ण और आसान बनाने की दिशा में मार्गदर्शन दिया।

Philosopher Acharya Prashant returned to India on Sunday after a landmark leg of his United Kingdom tour that took him to the platforms of Oxford University, Cambridge and the UK Parliament, where he placed the teachings of Vedanta and Indian Philosophy at the centre of global discourse on some of the defining questions of our times.

In 1879, Professor Max Muller carried the Ishavasya Upanishad to the West, publishing its first English translation through Oxford University Press as the opening volume of the 'Sacred Books of the East'. Nearly a century and a half later, an Indian philosopher has arrived at the same university to return the text to its living meaning.
FOR THE PRESS

आचार्य प्रशांत के मसूरी इंटरनेशनल स्कूल में छात्राओं के साथ संवाद और दून बुक फेस्टिवल में आयोजित उनके सत्र चर्चा के केंद्र बने।

"आचार्य प्रशांत ने बताया के प्रह्लाद कोई राजनीतिक विद्रोही नहीं है। वह भीतर की वह निर्मल असहमति है जो कहती है: 'नहीं। झूठ चाहे जितना शक्तिशाली हो, मैं उसका साथ नहीं दूंगा।' यह बात और भी तीखी इसलिए है क्योंकि हिरण्यकशिपु केवल राजा नहीं, पिता भी है। यानी होली की कथा कहती है, सत्य के सामने कोई रिश्ता बड़ा नहीं। सत्य के सामने कोई सत्ता बड़ी नहीं।"
"एक बार उपनिषदों ने यह कह दिया कि शिव के विषय में कोई कल्पना न करो, उन्हें कोई रूप-रंग, आकार देने का प्रयास न करो। उनके बारे में कोई किस्से-कहानी सोचना ही धृष्टता है, तो उसके बाद और कहीं भी आपको बताया जा रहा हो कि लो शिव के बारे में यह कथा ले लो, यह कहानी ले लो, आपको उन सब कथाओं को तुरंत अस्वीकार कर देना चाहिए।"

इस लेख में अमर उजाला ने आचार्य प्रशांत के चुनावी वीडियो पर चर्चा की है, जहां उन्होंने बताया कि भारतीय राजनेता कैसे होने चाहिए और उन्हें बड़े मुद्दों जैसे जलवायु परिवर्तन पर बात करनी चाहिए। उन्होंने देश के नेताओं के लिए क्या गुणवत्ता और दृष्टिकोण आवश्यक है, इस पर भी अपने विचार दिए हैं।

इस लेख में आचार्य प्रशांत ने अमर उजाला में विचार व्यक्त किए हैं कि सुख-सुविधाओं से आदमी में एक ग़लतफ़हमी फैल गई है कि अध्यात्म की क्या जरुरत है। उन्होंने बताया है कि अध्यात्म से आंतरिक खुशी प्राप्त होती है, जो केवल बाहरी सुखों से नहीं मिल सकती और जब रिश्ते सहज नहीं होते, तो ज़िंदगी सबक सिखाती है।

आचार्य प्रशांत ने अमर उजाला के इस लेख में विचार व्यक्त किया है कि हमें यह भ्रम नहीं रखना चाहिए कि दुनिया हम पर चल रही है। उन्होंने कहा है कि हमें बुद्धि को मुक्त छोड़ना चाहिए, जो अपना काम जानती है, स्मृति भी अपना काम जानती है, पूरी व्यवस्था भी अपना काम जानती है। वह कहते हैं कि हर कोई अपना काम कर लेगा, और तुम्हें हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

इस लेख में आचार्य प्रशांत ने दैनिक जागरण में दूसरों की मदद करने के महत्व और सीमाओं पर चर्चा की है। उन्होंने समझाया है कि अपनी मुक्ति की चाह में हमें आत्मकेंद्रित नहीं होना चाहिए और दूसरों की मदद भी करनी चाहिए। यह लेख यह भी बताता है कि कैसे अपनी मदद और दूसरों की मदद में संतुलन बनाना चाहिए ताकि समाज में सहयोग और समरसता बनी रहे।
इस लेख में आचार्य प्रशांत ने अमर उजाला में देह के सही उपयोग पर चर्चा की है। उन्होंने बताया कि देह केवल काम वसूलने के लिए है, इसे सजाने या सुरक्षित रखने के लिए नहीं। यह एक नई सोच है, जिसमें सन्यासी भी फुटबॉल खेलते हुए दिखते हैं। आचार्य प्रशांत ने बताया कि यह पुरानी मान्यता के विपरीत है, जहां बूढ़े भारत की सोच थी कि सन्यासी खेलते हुए नहीं दिखने चाहिए। यह लेख पारंपरिक विचारों को चुनौती देता है और जीवन के प्रति एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

आचार्य प्रशांत ने अमर उजाला में लिखा है कि प्रकृति में न्याय-अन्याय जैसा कुछ नहीं होता। उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे शेर हिरण को खा जाता है और बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है, इसमें न्याय कहाँ है? प्रकृति में केवल एक व्यवस्था है, एक विधि है। वहां न्याय खोजना मूर्खता है। आचार्य प्रशांत ने प्रकृति की इस सत्यता को समझाने का प्रयास किया है कि यह केवल नियमों और संतुलन पर आधारित है, न कि हमारी मानवीय धारणाओं पर।


इस लेख में दैनिक भास्कर ने प्रकाशित किया है की आचार्य प्रशांत ने गीता दीपोत्सव में कहा कि जीवन बदलने के लिए ज्ञान का एक दीपक ही पर्याप्त है। इस समारोह में देश के विभिन्न राज्यों से हजारों साधक पहुंचे। आचार्य प्रशांत ने संत कबीर के दोहों पर विस्तार से चर्चा की और बताया कि दिवाली तभी सार्थक होती है जब मन में भी प्रकाश हो। उन्होंने गीता के महत्व पर भी प्रकाश डाला और बताया कि यह ग्रंथ मानव को जीवन जीने का सही मार्ग दिखाता है। समारोह में उपस्थित साधकों ने आचार्य प्रशांत के प्रवचनों से प्रेरणा प्राप्त की और ज्ञान के इस दीपक को अपने जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत कहते हैं की रावण हो या हनुमान, या फिर विभीषण हृदय में तो सबके राम ही होते हैं। हनुमान का ये है कि राम उनके हृदय में भी हैं, और राम उनके जीवन में भी हैं। रावण का ये है कि जीवन तो उसका रावण का है और दिल उसने राम को दे रखा है। तो फिर वहां पर क्या आ जाता है? विभाजन आ जाता है, द्वंद आ जाता है।

आचार्य प्रशांत ने अमर उजाला में लिखा है कि विचार और भावनाओं के बीच की दीवार बहुत पतली होती है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति भावनाओं से मुक्ति पा लेता है और भावनाओं को महत्व देना कम कर देता है, उसने एक बड़ी लड़ाई जीत ली है। आचार्य प्रशांत के अनुसार, भावनाएं अक्सर हमारे विचारों को प्रभावित करती हैं और इस तरह से जीवन की सच्चाई को देखने में बाधा डालती हैं। जब हम भावनाओं को कम महत्व देते हैं और उन्हें नियंत्रित कर लेते हैं, तो हम मानसिक और आध्यात्मिक दृष्टि से स्वतंत्रता प्राप्त कर सकते हैं।

आचार्य प्रशांत अमर उजाला में लिखते हैं, धर्म का वास्तविक उद्देश्य होता है इंसान को उसके बंधन से और दुःख से आजाद करना और जब धर्म वास्तविक नहीं होता, आपको आनंद नहीं दे पाता तो आप चिढ़े-चिढ़े घूमते हो क्योंकि सब कुछ पालन करने के बाद भी भीतर से कोई त्रिप्ती शांति मिल नहीं रही होती। ऐसे में कोई आ करके थोड़ा आपको कोच दे, थोड़ा आपके जो भी इष्ट हैं, उनको एक दो चुभती बातें बोल दे तो आप के भीतर तुरंत विस्फोट हो जाएगा, हिंसा ऐसे ही जन्म लेती है।

आचार्य प्रशांत ने अमर उजाला के इस लेख में बताया है कि जीवन में किसी चीज़ से जल्दी प्रभावित होकर पीछे हटने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। उन्होंने समझाया कि जो कार्य हम कर रहे हैं यदि वह स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण है, तो उसे प्राथमिकता देनी चाहिए। लेख में आचार्य प्रशांत ने जोर दिया कि एक सरल और श्रेष्ठतम मन ही सच्चे आध्यात्मिकता को प्राप्त कर सकता है। उन्होंने कहा कि जो लोग भौतिक सुख-सुविधाओं में उलझ जाते हैं, वे सच्चे आध्यात्मिक आनंद से वंचित रह जाते हैं।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत महात्मा गांधी की शिक्षा और उनके आदर्शों की आज के समय में प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हैं। वे बताते हैं कि गांधीजी के सिद्धांत और उनके द्वारा स्थापित मूल्य वर्तमान समय में क्यों और कैसे महत्वपूर्ण हैं। लेख में गांधीजी के जीवन के विभिन्न पहलुओं और उनके द्वारा दी गई सीखों को आधुनिक संदर्भ में समझाने का प्रयास किया गया है।

अमर उजाला के इस लेख में, आचार्य प्रशांत ने एआई और चैट जीपीटी की सीमाओं पर चर्चा की है। वे बताते हैं कि एआई मानवीय गुणों जैसे प्रेम, करुणा और आध्यात्मिकता को नहीं समझ सकता।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत आलस्य के कारण मन में उत्पन्न होने वाली उदासीनता और निराशा के बारे में बताते हैं। वे इस बात पर जोर देते हैं कि धन के अभाव में व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाता है, जिससे गुलामी की स्थिति उत्पन्न होती है। आचार्य प्रशांत यह समझाते हैं कि आलस्य से निकलने का एकमात्र उपाय आत्मानुशासन और आत्मसाक्षात्कार है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत लिखते है सनातन धर्म का अर्थ है जो काल की सीमाओं से परे हो, जिसमें निरंतरता हो। जो धर्म समय के अनुसार बदलता रहे, वही सनातन धर्म है। यह आपको हमेशा शांति की ओर अग्रसर करता है। आज का जो व्यावहारिक धर्म है, उसमें बदलाव की आवश्यकता है ताकि सनातन धर्म की मूल भावना को बनाए रखा जा सके। यह धर्म व्यक्ति को मानसिक और आत्मिक मुक्ति की ओर ले जाता है, उसे भय, भ्रम, और अज्ञान से मुक्त करता है, और उसे सच्चे ज्ञान की ओर प्रेरित करता है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत लिखते है हर पर्व हमें यह सिखाता है कि हम खुद को बदलें, हरेक पर्व यह अवसर देता है कि हम अपने जीवन को नई दिशा दें। जन्माष्टमी पर हमें श्रीकृष्ण के संदेशों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए। श्रीकृष्ण का संदेश हमें प्रेम, सत्य, और कर्तव्य की राह पर चलने की प्रेरणा देता है। यह पर्व हमें आत्मनिरीक्षण का मौका देता है, जिससे हम अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं।

आज के समय में अनुभव और श्रेष्ठजनों की शिक्षाओं का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि यदि हम उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाएं, तो हमें सफलता प्राप्त हो सकती है। श्रेष्ठजनों की सीख हमें सही दिशा में मार्गदर्शन करती है और हमारे जीवन को सफल बनाने में सहायक होती है। उनका मार्गदर्शन हमारे व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन को समृद्ध बना सकता है।

इस लेख में बताया गया है कि युवा पीढ़ी को आध्यात्म और भारतीय संस्कृति से जोड़ने की आवश्यकता है। आचार्य प्रशांत ने संस्कृति के अंधानुकरण के बजाय आत्म-साक्षात्कार पर जोर दिया है। प्रकाशित: अमर उजाला, 12 जुलाई 2023।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने जीवन में अपने लक्ष्यों को स्वयं निर्धारित करने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि दूसरों के लक्ष्यों की नकल करने से सफलता नहीं मिलती। असली सफलता तभी प्राप्त होती है जब लक्ष्य खुद तय किया जाए और उस पर ईमानदारी से काम किया जाए। अपनी पहचान और रुचियों के अनुसार लक्ष्य निर्धारण करना जीवन को सही दिशा देता है और सफलता की संभावनाएं बढ़ाता है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने खेल और जीवन के मैदान में जीत और हार के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि असली उद्देश्य सिर्फ जीतना नहीं, बल्कि अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना है। हर प्रदर्शन हमें पहले से बेहतर बनाता है, और इसमें हार का भी महत्व है। आचार्य प्रशांत के अनुसार, सही दृष्टिकोण से जीत और हार दोनों से सीखा जा सकता है, जिससे जीवन में संतुलन और स्थिरता आती है। जीवन को खेल की तरह अपनाकर ही हम असली सफलता पा सकते हैं।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने प्रतियोगी परीक्षाओं में असफलता से निराश न होने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि जीवन में कई बार असफलता एक बड़ी सफलता का आधार बनती है। असफलता से निराश होकर रुकने के बजाय उससे सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने बताया कि निरंतर प्रयास और आत्म-विश्लेषण से ही वास्तविक सफलता प्राप्त की जा सकती है। असफलता को एक सीख के रूप में स्वीकारें और उससे प्रेरणा लेकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ें।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने मानव जीवन में कर्म के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि हमारे कर्म ही जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। घर-परिवार से लेकर दुनियादारी निभाने तक, हर पहलू में कर्म की अहमियत है। उन्होंने बताया कि सही कर्म करने से ही मनुष्य सच्चे अर्थों में मानवता का पालन कर सकता है। जीवन में कर्म और मनुष्यता का गहरा संबंध है, जो हमारे भविष्य को आकार देता है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने कहा कि अपने जीवन की जिम्मेदारियों को समझना और उन्हें पूरी तरह निभाना सफलता की कुंजी है। हर कार्य की जिम्मेदारी स्वयं लेने से व्यक्ति अपने जीवन में सुधार कर सकता है। उन्होंने बताया कि आत्मनिर्भरता और स्वयं की जिम्मेदारी उठाना जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है। अपनी जिम्मेदारियों को स्वीकार करना और उनका पालन करना ही सच्ची सफलता का मार्ग है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि सकारात्मक सोच और प्रेरणा से जीवन की कठिनाइयों को आसानी से हल किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि हमारी सोच का प्रभाव हमारे कार्यों और परिणामों पर पड़ता है। हर स्थिति में प्रेरित और सकारात्मक रहने से हम अपनी क्षमताओं को पहचानते हैं और अपने लक्ष्यों को हासिल कर सकते हैं।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि खुद को बेसहारा समझने की बजाय आत्मविश्वास के साथ सिर उठा कर जीना सीखें। आत्मनिर्भरता से जीवन में आने वाली हर चुनौती का सामना किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अपनी कमजोरियों को पहचानकर उन्हें अपनी ताकत बनाएं। सही दृष्टिकोण और मेहनत से कोई भी कमजोरी ताकत में बदल सकती है। यह लेख बताता है कि आत्म-विश्वास और संकल्प शक्ति से कैसे हर मुश्किल को पार किया जा सकता है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि भारतीय संस्कृति में गुरु का दर्जा भगवान के समान माना जाता है। गुरु हमें सही संस्कारों की राह पर चलने की शिक्षा देकर हमारा मार्ग प्रशस्त करते हैं। एक सच्चा गुरु पथ-प्रदर्शक की तरह होता है, जो हमारे जीवन को सही दिशा में ले जाने में मदद करता है। गुरु का महत्व इसलिए भी है क्योंकि वे हमें आत्मिक ज्ञान और जीवन के सही मूल्य सिखाते हैं, जिससे हम जीवन में सफल और संतुष्ट हो सकें।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि आरामपरस्त जीवनशैली को त्यागकर जिम्मेदारियों का बोझ उठाना आवश्यक है। जब तक आप जिम्मेदार नहीं बनेंगे, तब तक जीवन के दौड़ में पीछे ही रह जाएंगे। उन्होंने समझाया कि आत्मनिर्भरता और जिम्मेदारी निभाने से ही व्यक्ति जीवन में सफलता और संतुष्टि पा सकता है। अपनी जिम्मेदारियों को निभाना सच्चे आत्मसम्मान और आत्मविकास का मार्ग है।

अमर उजाला के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि जीवन में सफल होने के लिए लक्ष्य निर्धारित करना आवश्यक है, लेकिन उसे प्राप्त करने के लिए मशीन की तरह काम करना नहीं, बल्कि रचनात्मक सोच को अपनाना जरूरी है। उन्होंने समझाया कि मनुष्य केवल भौतिक कार्यों का निष्पादन करने वाला यंत्र नहीं है, बल्कि उसमें आत्मिक और रचनात्मक क्षमताएं भी हैं। सही दृष्टिकोण और रचनात्मकता से ही जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है।

अमर उजाला में प्रकाशित आचार्य प्रशांत के इस लेख में जीवन में लक्ष्य निर्धारित करने और उन्हें प्राप्त करने की संकल्प शक्ति पर जोर दिया गया है। वह बताते हैं कि संकल्प शक्ति से व्यक्ति अपने प्रयासों को सही दिशा में केंद्रित कर सकता है, जिससे सफलता के द्वार खुलते हैं। इस लेख में उन्होंने संकल्प शक्ति को मजबूत करने के तरीकों पर चर्चा की है और बताया है कि कैसे संकल्प शक्ति से जीवन में सकारात्मक बदलाव लाए जा सकते हैं।

अमर उजाला में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि जीवन में हार और जीत के अनुभव कैसे हमारी मानसिकता और जीवन दृष्टिकोण को प्रभावित करते हैं। वह उदाहरण देते हैं कि कैसे इतिहास के कई महान व्यक्तियों ने अपनी हार से सीखा और आगे बढ़े। उनके विचार में, सच्ची जीत वही है जो हमारी आत्मा को मजबूती और मन को शांति प्रदान करे, चाहे परिणाम कुछ भी हो। यह लेख प्रेरणा देता है कि हम हर परिस्थिति में धैर्य और साहस के साथ खड़े रहें।

अध्यात्म ज्ञान के माध्यम से शिक्षा को स्कूल-कॉलेज की किताबों से परे तक ले जाता है। अमर उजाला में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत ने समझाया कि शिक्षा का उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना नहीं है, बल्कि जीवन की गहरी समझ और सार्थकता को बढ़ाना भी है। अध्यात्मिक शिक्षा मनुष्य को आत्म-ज्ञान और सही दिशा की ओर मार्गदर्शित करती है, जिससे जीवन में वास्तविक पूर्णता और संतुलन प्राप्त होता है।

अमर उजाला में प्रकाशित आचार्य प्रशांत का यह लेख आध्यात्मिक ग्रंथों की महत्वपूर्णता पर प्रकाश डालता है। वे बताते हैं कि जीवन की समस्याओं का समाधान और आत्मिक शांति पाने के लिए ग्रंथों का अध्ययन कैसे सहायक हो सकता है। इस लेख में आचार्य ने ग्रंथों के अध्ययन की महत्ता और उनके जीवन में योगदान पर विस्तृत चर्चा की है।

अमर उजाला में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं मन चंचल जरूर होता है लेकिन इसकी चंचलता पर अगर आपने विजय पा ली तो यकीन मानें अपनी दुल्हना पर विजय पा ली। मन को सही दिशा में नियंत्रित करने के लिए अनुशासन और सतत अभ्यास आवश्यक हैं। जीवन में सच्चे लक्ष्य का निर्धारण करके, मानसिक शांति और सशक्तिकरण प्राप्त किया जा सकता है।

अमर उजाला में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं समस्याओं से डटकर सामना करना सीखो। इन समस्याओं से जब तक भिड़ोगे नहीं, तब तक अपनी ताकत का एहसास भी नहीं कर पाओगे और न ही जीवन में आगे बढ़ पाओगे।



आचार्य प्रशांत ने अमर उजाला में अपने लेख में बताया कि आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए धर्मग्रंथों का अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने गीता का उदाहरण देकर समझाया कि सत्य की प्राप्ति और आत्मज्ञान के लिए धर्मग्रंथों की ओर जाना महत्वपूर्ण है। वर्तमान समय में धार्मिक स्थल केवल पर्यटन स्थल बनकर रह गए हैं, जबकि उनका असली उद्देश्य आध्यात्मिकता और ज्ञान का प्रसार करना है।

"अमर उजाला" में आचार्य प्रशांत के लेख में बताया गया है कि अगर आपका लक्ष्य स्पष्ट और अडिग है, तो सफलता सुनिश्चित है। आचार्य प्रशांत ने इस पर बल दिया कि जीवन में सच्ची सफलता वही है, जो आत्म-बोध और आत्म-साक्षात्कार से प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि बाहरी दुनिया की उपाधियों और उपलब्धियों से परे, अपने अंदर के सत्य को जानना और उसके अनुसार जीवन जीना ही असली सफलता है।

"अमर उजाला" में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि लोग किसी लक्ष्य पर इसलिए नहीं चल पाते क्योंकि उनकी लक्ष्य-निर्धारण प्रक्रिया ही गलत होती है। उन्होंने कहा कि जब तक व्यक्ति आत्मबोध और स्व-अवलोकन के माध्यम से अपने सच्चे उद्देश्यों को नहीं समझता, तब तक उसे अपने लक्ष्यों में सफलता नहीं मिल सकती। आचार्य प्रशांत ने सही दिशा में समर्पित और संकल्पित प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया, जिससे व्यक्ति अपने वास्तविक लक्ष्यों को प्राप्त कर सके।

आचार्य प्रशांत ने अमर उजाला में कहा कि जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए निडरता जरूरी है। उन्होंने बताया कि डर के अनुभव से गुजरने पर ही हम अपने वास्तविक सामर्थ्य को पहचान पाते हैं। आचार्य प्रशांत ने निडर जीवन पर आयोजित कार्यशाला में यह भी समझाया कि डर को पहचानना और उसका सामना करना महत्वपूर्ण है। डर से बचने के बजाय उसका सामना करने से ही हम जीवन में सच्ची प्रगति कर सकते हैं।

आचार्य प्रशांत ने "अमर उजाला" में कहा कि हमारे निर्णय हमारी सफलता की कहानी गढ़ते हैं। उन्होंने बताया कि सही निर्णय लेना ही सच्ची सफलता की कुंजी है। आचार्य प्रशांत ने जोर दिया कि निर्णय लेते समय हमें अपने आंतरिक सत्य और वास्तविक उद्देश्य को ध्यान में रखना चाहिए। सही निर्णय वही है जो हमें आत्मज्ञान और आंतरिक शांति की ओर ले जाए, न कि केवल बाहरी उपलब्धियों की ओर। लेख में उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों को साझा करते हुए सही निर्णय लेने के महत्व पर प्रकाश डाला।

आचार्य प्रशांत ने "अमर उजाला" में बताया कि सच्चा प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता। उन्होंने कहा कि किसी भी चुनौती का सामना करते समय ईमानदारी और पूर्ण समर्पण से कार्य करना ही महत्वपूर्ण है। चाहे परिणाम हार हो या जीत, यह मायने नहीं रखता, बल्कि मायने रखता है उस प्रक्रिया में आपकी ईमानदारी और निष्ठा। आचार्य प्रशांत ने सिखाया कि बाहरी परिणामों पर ध्यान देने के बजाय, अपने आंतरिक सत्य के साथ जुड़कर कर्म करना ही सच्ची सफलता है।

"अमर उजाला" में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत ने युवाओं को मांसाहार त्यागकर शाकाहारी बनने की प्रेरणा दी है। उन्होंने बताया कि उनकी संस्था के प्रयासों से 50 लाख लोग मांसाहार छोड़ चुके हैं। आचार्य प्रशांत ने शाकाहार के स्वास्थ्य और पर्यावरण लाभों पर जोर दिया, जिससे समाज में सकारात्मक परिवर्तन आ रहा है।

अमर उजाला के अनुसार, अचार्य प्रशांत ने कोरोना महामारी के दौरान ऑनलाइन मुफ्त काउंसलिंग दी। उन्होंने आत्मबोध और मानसिक शांति के माध्यम से लोगों को सहारा दिया। उनके सत्रों ने अनिश्चितता और तनाव के समय में मार्गदर्शन प्रदान किया।

