Coverage of his work in the national and international press: his gatherings, dialogues, recognitions, and milestones.

Renowned philosopher and bestselling author Acharya Prashant returned to India on Sunday after presenting eloquently on Indian philosophy, Vedanta and Upanishads at renowned global forums like Oxford University, Cambridge University and the UK Parliament. A large crowd gathered at Indira Gandhi International Airport to greet him with the tricolor, welcome messages, and congratulatory letters.

Nearly 145 years after Max Muller carried the Isha Upanishad to Oxford as a scholarly object, Acharya Prashant returned it to the same university as a living teaching — arguing, in the very building where economics and policy are taught, that no external solution can resolve humanity's crises without first examining the consuming ego that drives them.
दैनिक भास्कर में प्रकाशित लेख के अनुसार ग्रेटर नोएडा में आयोजित 'गीता समागम' श्रृंखला के तीसरे अध्याय 'कर्मयोग' पर आचार्य प्रशांत ने सत्र का संचालन किया। इस सत्र में उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों को सरल और सहज भाषा में प्रस्तुत कर, आम लोगों के जीवन को अर्थपूर्ण और आसान बनाने की दिशा में मार्गदर्शन दिया।

Philosopher Acharya Prashant returned to India on Sunday after a landmark leg of his United Kingdom tour that took him to the platforms of Oxford University, Cambridge and the UK Parliament, where he placed the teachings of Vedanta and Indian Philosophy at the centre of global discourse on some of the defining questions of our times.

In 1879, Professor Max Muller carried the Ishavasya Upanishad to the West, publishing its first English translation through Oxford University Press as the opening volume of the 'Sacred Books of the East'. Nearly a century and a half later, an Indian philosopher has arrived at the same university to return the text to its living meaning.
FOR THE PRESS

This is pre-launch book review. Book will be launched soon.
Acharya Prashant in LondonAcharya Prashant in LondonAcharya Prashant in LondonAcharya Prashant in LondonAcharya Prashant in LondonAcharya Prashant in London
"The investigation into 2026 NEET-UG cancellation will produce arrests, possibly convictions, and a reformed NTA with a strengthened testing protocol; the twenty-two lakh students who sat on May 3 deserve nothing less. But the reformed examination will still fill its halls with candidates who do not know why they are there, whose years were arranged around a credential that was always standing in as a substitute for the self-knowledge that no curriculum, reformed or otherwise, has ever offered them."

This fact is going to add under Digital Media Artciles

A special dialogue session with Acharya Prashant — a Vedanta scholar and author — was organized on Sunday at the Indradhanush Auditorium in Sector-5. This event was held for the first time in Panchkula, drawing a large number of participants. Approximately 2,000 people attended in person, while more than 100,000 viewers watched online. Every seat in the auditorium was occupied, and additional space had to be arranged for the overflow.

Addressing a massive gathering of over 100,000 online and on-ground attendees at the Indradhanush Auditorium, Acharya Prashant delivered a powerful message on societal conditioning. Commenting on recent media controversies, he urged society to transcend the archaic mindset that reduces women to objects, calling for systemic introspection into how gender roles alter behavior and language.

"On the occasion of India's 77th Republic Day, philosopher and author Acharya Prashant said that the idea of a Republic cannot be reduced to a Constitutional structure alone and that the strength of the nation ultimately depends on the inner awakening of its citizens."

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"चार दिवसीय प्रोग्राम में NIT, AIIMS समेत कई जगहों पर आचार्य आचार्य प्रशांत मिलेंगें रायपुर वासीयों से। एयरपोर्ट पर पहुंचते ही रायपुर की बड़ी मीडिया चैनलों से बातचीत में आचार्य जी ने बताया रायपुर आने का कारण"

छात्रों, डॉक्टरों और युवाओं से संवाद बने चर्चा के विषय।

"The real war is the one the ego wages against honest seeing, the war between what it is and what it insists on being taken for. It is the hunger the ego carries meeting a reality that will not satisfy it; the persistent feeling that something is missing whose name cannot be found because finding it would require looking at the one who feels it."

"आध्यात्मिक वक्ता और लेखक आचार्य प्रशांत ने इंदौर के लता मंगेशकर सभागार में रोजमर्रा की जिंदगी, आत्मसमझ, डर और समाज से जुड़े कई सवालों पर बात करते हुए कहा कि आज धर्म के नाम पर बहुत कुछ किया जाता है, लेकिन हर चीज आध्यात्म नहीं है।"

“महाशिवरात्रि पर दार्शनिक और लेखक आचार्य प्रशांत हमारे लिए कुछ नया और गहरा लेकर आए। उन्होंने एक खास नाट्य प्रस्तुति दी। इस प्रस्तुति में कला के प्रति उनका लगाव और ज्ञान के प्रति उनका समर्पण एक साथ दिखाई दिया।”

“आचार्य प्रशांत दिल्ली में आयोजित ‘दिल्ली लिटरेचर फेस्टिवल’ में पहुंचे थे l इस दौरान उन्होंने न्यूज़ 18 से खास बातचीत में कहा कि एक बार कड़ी विभाजन की रेखा अगर हमने बना दी, इसके बाद दोनों पक्षों को समझना बेहद मुश्किल हो जाता है l उसके बाद साधारण बातें भी साजिश जैसी लगने लगती हैं l फिर वास्तविक साजिश नजर नहीं आती है l लोगों को लगने लग जाता है कि हमारा दुश्मन कहीं बाहरी है l”

"नई दिल्ली। 77वें गणतंत्र दिवस से पूर्व आचार्य प्रशांत ने गहन संदेश दिया कि बाहरी ढांचे से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है भीतर की जागृति। गणतंत्र का सच्चा स्वरूप तभी पूर्ण होता है जब नागरिक स्वयं के अंतर्मन को मुक्त करें।"

“भीतरी और बाहरी स्वतंत्रता के संबंध पर आचार्य प्रशांत ने गीता का उदाहरण देते हुए कहा की कुरुक्षेत्र के मैदान पर जब अर्जुन के सामने बड़ा विषम बाहरी युद्ध है, तो श्रीकृष्ण अर्जुन को यह नहीं सिखाते कि बाहरी युद्ध लड़ना कैसे है। श्रीकृष्ण अर्जुन को भीतरी ज्ञान देते हैं। जिसके पास भीतरी स्वतंत्रता होगी, उसे बाहरी तौर पर भी गुलाम नहीं बनाया जा सकता।”

"लेखक आचार्य प्रशांत अपने बेबाक विचारों के लिए जाने जाते हैं। वे अक्सर ही रूढ़िवादी सोच, रिश्तों और अन्य संवेदनशील सामाजिक मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखते हैं। इसी क्रम में हाल ही में उन्होंने बेटियों के प्रति पिता की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं।"

"16 जनवरी को गांधी मैदान के निकट ऐतिहासिक बापू सभागार में आचार्य प्रशांत का पहला पटना संवाद अविस्मरणीय रहा। यह कार्यक्रम निर्धारित समय से कहीं अधिक चला और लगभग चार घंटे बाद समाप्त हुआ। कड़ाके की ठंड के बावजूद देर रात तक लगभग पाँच हज़ार श्रोता अपनी जगह पर बैठे रहे। सत्र समाप्त होने के बाद पुस्तक हस्ताक्षर के लिए किलोमीटर लंबी कतार लगी, जो आधी रात के बाद तक जारी रही। हज़ारों श्रोताओं ने उनकी 'ट्रूथ विदाउट अपोलॉजी' व अन्य पुस्तकों पर हस्ताक्षर लिए।"

"बाहरी दीये बुझेंगे, लेकिन भीतर का दीप अगर जल गया तो वो जीवनभर राह दिखाएगा। इसलिए, इस बार दीवाली मनाने से पहले ज़रा रुकिए और देखिए, क्या भीतर अभी भी कोई अंधेरा बाकी है? अगर हाँ, तो वही जलाइए, वही फोड़िए वही होगी आपकी सच्ची दीवाली।"

‘‘हमें पूछना चाहिए… अगर कोई छल-कपट और चालबाज़ी से आगे बढ़ता है, तो क्या वह सम्मान का पात्र है? क्या हम ज्ञान, प्रयास और न्याय को सम्मान दिलाने के लिए तैयार हैं? जब तक हम ऐसा नहीं करेंगे, ऐसी असफलताएं हमारे युवाओं को खोखला करती रहेंगी।’’

"फाउंडेशन का उद्देश्य है कि व्यक्ति अपने जीवन में समाजिक कंडीशनिंग, उपभोक्तावाद और जड़ धार्मिक विश्वासों पर सवाल उठाकर आंतरिक स्पष्टता प्राप्त करे. इसके लिए प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन विभिन्न माध्यमों से जागरूकता फैलाता है—लाइव सत्र, वेदांत शिविर, डिजिटल कोर्स, ग्रंथ-चर्चाएं, और हजारों वीडियो व्याख्यानों के माध्यम से. हाल ही में फाउंडेशन ने PVR INOX जैसे प्रमुख सिनेमा चेन के साथ साझेदारी की है, जिसके अंतर्गत आचार्य प्रशांत के लाइव सत्र देशभर के 20 से अधिक शहरों में सिनेमाघरों में प्रसारित किए जा रहे हैं. यह पहल उन्हें नई पीढ़ी तक पहुँचाने का अभिनव प्रयास है."
नवभारत - आचार्य प्रशांत ने जाति जनगणना को लेकर दिया महत्वपूर्ण संदेश: आचार्य प्रशांत ने कहा कि अगर जाति जनगणना का इस्तेमाल अधिक सटीक और कुशल नीति निर्माण के लिए हाशिए पर पड़े समुदायों की पहचान करने के लिए किया जाता है तो यह एक अच्छा कदम है।
आचार्य प्रशांत ने कहा कि आतंकियों को याद रखना चाहिए कि यह गीता की धरती है। उन्होंने कहा, “चौंकाने वाली बात मुझे यह लगती है कि हम बुरी शक्तियों से लड़ने के बारे में सोच लेते हैं, बिना गीता के और बिना शक्ति के। अगर अर्जुन को गीता का ज्ञान नहीं मिलता, तो वह एक भी बाण नहीं चला पाते। गीता चाहिए होती है। सारे के सारे देवता एक साथ थे, लेकिन फिर भी असुरों का सामना नहीं कर पा रहे थे। असुरों से लड़ने के लिए दिव्यता चाहिए, शक्ति चाहिए — और शायद वहीं पर चूक हो जाती है।”
पहलगाम हमले के बाद भारतीयों को क्या करना चाहिए? - AajTak : आचार्य प्रशांत ने कहा कि कश्मीर इस हमले का सबसे बड़ा पीड़ित है. वहां के लोगों ने अपनी रोज़ी-रोटी के लिए गाड़ियों और होटलों के लिए कर्ज लिया हुआ है। अब हिंसा के माहौल में वे कर्ज कैसे चुकाएंगे? दुश्मनों की मंशा है कि कश्मीर भारत से टूट जाए, इसलिए हमें इस समय कश्मीरियो का साथ देना चाहिए।
Pahalgam Terror Attack: पहलगाम हमले को लेकर देश के हर हिस्से में दुख और गुस्सा है। आध्यात्म से जुड़े लोग भी इस हमले की निंदा कर रहे हैं और आतंकवाद को बुरा बता रहे हैं। मशहूर लेखक और प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के प्रमुख आचार्य प्रशांत ने भी पहलगाम हमले पर गुस्सा जताया। उन्होंने आतंकियों को चेतावनी दी कि भारत गीता की धरती है और गीता को मानने वाले लोग कभी भी अन्याय के सामने हार नहीं मानते।
इस मुलाकात के दौरान उन्होंने भारतीय दर्शन, विशेषतः वेदांत और श्रीमद्भगवद्गीता के प्रसार और उसके आधुनिक महत्व पर विस्तृत चर्चा की। बैठक के दौरान आचार्य प्रशांत ने यह बताया कि किस प्रकार वेदांत को आज के युवाओं और जनमानस तक आधुनिक माध्यमों के ज़रिए पहुंचाया जा सकता है। उन्होंने हाल ही में भोपाल स्थित पीवीआर, आइनॉक्स जैसे मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों एवं राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT), भोपाल में आयोजित विशेष प्रस्तुतियों का उल्लेख किया, जहां उन्होंने वेदांत पर आधारित विचारों को प्रभावी रूप से साझा किया।
आचार्य प्रशांत ने करीब छह घंटे तक अपने विचार साझा किए, जिसमें उन्होंने समकालीन मुद्दों जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), जलवायु परिवर्तन और उपभोक्तावाद पर चर्चा की। उनके विचारों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया, और उन्होंने इन विषयों को बेहद सरल और व्यावहारिक तरीके से प्रस्तुत किया, जिससे सभी उपस्थित लोग गहरे स्तर पर जुड़ सके। जल्द ही दूरदर्शन पर प्रसारित होगा दैनिक कार्यक्रम अब दूरदर्शन (प्रसार भारती) पर आचार्य प्रशांत का एक दैनिक कार्यक्रम प्रसारित होगा। इस शो के माध्यम से वेदांत के ज्ञान और उसकी आधुनिक प्रासंगिकता को लाखों दर्शकों तक पहुँचाया जाएगा।
बातचीत के दौरान कई ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा हुई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाएँ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नैतिकता, जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियाँ और उपभोक्तावाद का बढ़ता प्रभाव। आचार्य प्रशांत ने इन विषयों को केवल सैद्धांतिक रूप में नहीं रखा, बल्कि प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में उनके व्यावहारिक समाधान भी सुझाए। उनके विचारों में स्पष्टता और गहराई थी, जिससे श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए। क्या वाकई विज्ञान और आध्यात्मिकता एक साथ चल सकते हैं? इस सवाल का जवाब शायद इस शाम में ही छिपा था जब एक विज्ञान और तकनीक के गढ़ में बैठे छात्र और विद्वान वेदांत के ज्ञान से जुड़ने को उतावले दिखे। यह संवाद सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक दिशा थी जहाँ आधुनिक शिक्षा और प्राचीन ज्ञान एक साथ मिलकर भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं है। यह अपने साथ एक दृष्टि, एक जीवन जीने का तरीका, और पूरी सांस्कृतिक व आध्यात्मिक धरोहर लेकर चलती है। इसकी ध्वनियों में एक पूरे समाज का इतिहास गूंजता है और यह उन्हें उनकी जड़ों से जोड़े रखने का धागा है। भारत में सैकड़ों भाषाएँ बोली जाती हैं, और हर भाषा अपनी अनोखी कहानी कहती है, जो अपनेपन और जुड़ाव का गहरा अहसास कराती है। आम धारणा है कि दक्षिण भारत हिंदी का विरोध करता है। लेकिन वास्तविकता यह नहीं है। दक्षिण भारत में हिंदी का न केवल पर्याप्त प्रचार हुआ है, बल्कि वह कई क्षेत्रों में रोज़मर्रा की भाषा भी बन गई है। लेकिन फिर भी, अगर कहीं अस्वीकृति है, तो हमें समझना होगा कि इसका मूल कारण क्या है।
आचार्य प्रशांत का होली पर लेख, India News द्वारा प्रकाशित : "होली केवल रंगों और उमंग का पर्व नहीं, बल्कि यह अहंकार और मिथ्या पहचान के अंत का प्रतीक भी है। इस उत्सव का वास्तविक संदेश आत्मज्ञान और आंतरिक शुद्धि से जुड़ा हुआ है। लेकिन बदलती परंपराओं और दिखावे की संस्कृति के बीच, क्या हम इसके मूल भाव को खोते जा रहे हैं?"
"जब संत रविदास यह कहते हैं कि वे तथाकथित छोटी जाति में जन्मे हैं, तो वे वास्तव में अपनी जाति की बात नहीं कर रहे होते। संत किसी भी जाति और वर्ग की सीमाओं से परे होते हैं। वे जन्म से मिले शरीर को अपनी सच्चाई नहीं मानते। जब वे जन्म को तुच्छ कहते हैं, तो वे समस्त मानवजाति की शारीरिक स्थिति का वर्णन कर रहे होते हैं। वे यह कह रहे हैं कि केवल वही व्यक्ति, जो शरीर की पुरानी आदतों में फंसे रहने की प्रवृत्ति को स्पष्ट रूप से देख पाता है, उससे मुक्त हो सकता है। जो अपने ज्ञान पर अभिमान करता है, जो अपनी बुद्धिमत्ता से भरा हुआ है, वह सत्य की ओर बढ़ ही नहीं सकता। वहीं, जो विनम्र है, जो सबसे निचले स्थान पर बैठने को तैयार है, जो कतार में सबसे अंत में खड़े होने को तैयार है, वही वहाँ तक पहुँच सकता है।"
"इस हमले की तुलना नालंदा विश्वविद्यालय की उस ऐतिहासिक घटना से की जा सकती है, जब बख्तियार खिलजी ने वहाँ की पुस्तकालय को जला दिया था। उस समय भारत की सबसे बड़ी बौद्धिक धरोहर को राख बना दिया गया था। विडंबना यह है कि एक वैसा ही हमला, जिसे कभी भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी त्रासदियों में गिना जाता था, आज गंगा के किनारे कुंभ मेले के दौरान दोहराया जा रहा है। यह घटना यह भी दिखाती है कि किस तरह अज्ञानता और उग्रता मिलकर ज्ञान और विवेक के सबसे बड़े दुश्मन बन जाते हैं। आचार्य जी को उनके सुधारवादी प्रयासों की वजह से लगातार विरोध झेलना पड़ रहा है। वे जातिवाद, पितृसत्ता और अंधविश्वास को समाज की प्रगति में सबसे बड़ी रुकावट मानते हैं। उनके अनुसार, कुछ ताकतें इन्हें इसलिए बनाए रखना चाहती हैं क्योंकि इससे उनके स्वार्थ सिद्ध होते हैं।"
"गणतंत्र दिवस हमारे देश की स्वतंत्रता संग्राम की महानता का प्रतीक है, लेकिन आजादी का वास्तविक अर्थ केवल तिरंगे के तीन रंगों और राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान से कहीं अधिक है। यह सिर्फ एक प्रतीक नहीं, बल्कि एक गहरी और व्यापक स्वतंत्रता की भावना है, जिसे समझने की आवश्यकता है। जब हम आज़ादी के बारे में सोचते हैं, तो अक्सर हमारे मन में यह सवाल उठता है कि क्या आज़ादी सिर्फ तीन रंगों का नाम है, जो एक पहिये के सहारे चलते हैं, या इसका कोई और गहरा मतलब है? यह सवाल हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि आज़ादी का असली मतलब क्या है और हम उसे किस तरह से समझ सकते हैं।"
"हाल ही में सोशल मीडिया और कुछ यूट्यूब चैनलों पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें दावा किया गया कि आचार्य प्रशांत ने कुंभ को अंधविश्वास बताया है। इस वीडियो में एक पोस्टर दिखाया गया, जिसके आधार पर कुंभ में स्थित एक पुस्तक स्टॉल, जहां आचार्य प्रशांत की धार्मिक पुस्तकें वितरित की जा रही थीं, को आग के हवाले कर दिया गया। हालांकि, सच यह है कि आचार्य प्रशांत ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया है। उनकी संस्था ने भी साफ किया है कि इस पोस्टर को बनाने और फैलाने वाला व्यक्ति न तो उनकी संस्था से जुड़ा है और न ही कोई स्वयंसेवक है।"
कुंभ मेले के पवित्र आयोजन में हाल ही में एक ऐसी घटना घटी, जिसने हर जागरूक व्यक्ति को झकझोर कर रख दिया। वेदांत मर्मज्ञ और लोकप्रिय लेखक आचार्य प्रशांत के नाम से एक फर्जी पोस्टर वायरल किया गया। इस पोस्टर में झूठा दावा किया गया कि उन्होंने कुंभ मेले को “अंधविश्वास” करार दिया है। जाँच के बाद यह स्पष्ट हुआ कि यह दावा पूरी तरह झूठा और निराधार था। आचार्य प्रशांत ने ऐसा कोई बयान कभी नहीं दिया। इसके बावजूद, इस फेक न्यूज़ ने कुंभ के शांतिपूर्ण माहौल में हिंसा को भड़काने का काम किया। यह घटना महज एक संयोग नहीं हो सकती। कुंभ जैसे पवित्र आयोजन में ऐसी हिंसा और दुष्प्रचार योजनाबद्ध प्रतीत होते हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर कौन लोग ऐसे कृत्यों के पीछे हैं और उनका उद्देश्य क्या है? क्या यह साजिश सनातन धर्म के भीतर विचारशीलता और सुधार के प्रयासों को रोकने के लिए है?
कुंभ मेले में हाल ही में एक चौंकाने वाली घटना घटी। आचार्य प्रशांत के नाम से एक झूठा पोस्टर वायरल हुआ, जिसमें दावा किया गया कि उन्होंने कुंभ को अंधविश्वास बताया है। जाँच में यह दावा पूरी तरह से फर्जी निकला। आचार्य प्रशांत ने ऐसा कोई बयान कभी नहीं दिया। लेकिन इस झूठी खबर के कारण हिंसा भड़क गई। मौके पर मौजूद पूर्व सैनिक मोहन सिंह ने बताया कि यह पूरी तरह से सुनियोजित षड्यंत्र था। कुछ लोगों ने पहले फर्जी पोस्टर वायरल किया और फिर कुंभ में वितरित की जा रही आचार्य प्रशांत द्वारा लिखित भगवद गीता, उपनिषद, महाभारत, दुर्गा सप्तशती, शिव सूत्र और रामायण जैसी पुस्तकों को जला दिया। इतना ही नहीं, पुस्तक वितरकों के साथ मारपीट भी की गई।

पंजाब केसरी में प्रकाशित लेख में आचार्य प्रशांत रक्षा बंधन की गहरी और प्राचीन परंपरा पर प्रकाश डालते हैं। वे बताते हैं कि यह त्योहार केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं है, बल्कि पुराणों में इसका वर्णन एक ऐसे धागे के रूप में किया गया है जो सुरक्षा और सम्मान का प्रतीक है। यह परंपरा गुरुकुलों में गुरु-शिष्य के संबंधों और उपनिषदों के शांति पाठ के सिद्धांतों से भी जुड़ी है।

पंजाब केसरी के लिए: 78वें स्वतंत्रता दिवस पर आचार्य प्रशांत ने गीता के ज्ञान का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की सच्ची स्वतंत्रता तभी पूरी हो सकती है जब हम बाहरी स्वतंत्रता के साथ-साथ भीतरी स्वतंत्रता भी प्राप्त करें। उन्होंने श्रीकृष्ण के दर्शन को आत्मनिर्भरता की नींव बताते हुए कहा कि आध्यात्मिक गहराई के बिना भारत की आत्मनिर्भरता अधूरी रहेगी।

पत्रिका: स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आचार्य प्रशांत ने कहा कि सच्ची स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक मुक्ति से जुड़ी है। उन्होंने बताया कि राष्ट्रों के बीच के संघर्ष हमें हमारी पशु प्रवृत्तियों से जोड़ते हैं। आचार्य जी ने आह्वान किया कि सच्ची प्रगति के लिए हमें आंतरिक जागरूकता लानी होगी और अपने भीतर की स्वतंत्रता को पहचानना होगा।

Punjab Kesari: Acharya Prashant ने सरकारी नौकरी की तैयारी के लिए कोचिंग संस्थानों के शोषण और युवाओं में बढ़ते डिप्रेशन को एक खतरनाक सामाजिक बीमारी कहा है। उन्होंने बताया कि यह समस्या समाज में गहरी जड़ें जमा चुकी है, जहां लाखों युवा अपने बहुमूल्य समय और धन को व्यर्थ कर रहे हैं। Acharya Prashant के अनुसार, इस मुद्दे पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।

आचार्य प्रशांत ने पंजाब केसरी से बात करते हुए कहा कि क्लाइमेट कन्वर्सेशन का सबसे बड़ा संकट यही है कि इसे केवल तब महत्व दिया जाता है जब कोई बड़ी दुर्घटना हो जाती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि पर्यावरण संकट एक लगातार चलने वाली समस्या है, न कि केवल एक हादसे के दौरान चर्चा का विषय।

देश की आबादी खतरनाक रफ्तार से बढ़ती चली जा रही है। आचार्य प्रशांत ने राजस्थान पत्रिका में विचारोत्तेजक लेख में समझाते हैं कि आबादी बढ़ने से महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं। उन्होंने सरकार को इस पर नियंत्रण लगाने की दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। पढ़िए आचार्य प्रशांत का विस्तृत विश्लेषण और समाधान प्रस्ताव।

दैनिक भास्कर में प्रकाशित लेख आचार्य प्रशांत के अनुसार यूट्यूब के शीर्ष आध्यात्मिक शिक्षक के रूप में उभरे हैं, जिनके 50 मिलियन सब्सक्राइबर्स हैं। उन्होंने जलवायु परिवर्तन, पशु क्रूरता, महिला सशक्तिकरण और अन्य आध्यात्मिक शिक्षाओं जैसे विषयों में कई युवाओं का मार्गदर्शन किया है। उनके विचार और शिक्षाएं नई पीढ़ी को प्रेरित कर रही हैं और समाज में सकारात्मक बदलाव ला रही हैं।

राष्ट्र्रीय सहारा में प्रकाशित लेख में आचार्य प्रशांत को यूट्यूब के शीर्ष आध्यात्मिक शिक्षक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिनके 50 मिलियन सब्सक्राइबर्स हैं। आचार्य प्रशांत ने जलवायु परिवर्तन, पशु क्रूरता, महिला सशक्तिकरण जैसे विषयों पर युवाओं का मार्गदर्शन किया है, साथ ही अपनी आध्यात्मिक शिक्षाओं से उन्हें प्रेरित किया है। उनके तर्कसंगत विचार और शिक्षाएं युवाओं के बीच अत्यधिक लोकप्रिय हो रही हैं।

इस लेख में आचार्य प्रशांत ने दैनिक जागरण में जानवरों के साथ हो रही क्रूरता पर बात की है। उन्होंने इसे रोकने के लिए समाज को कैसे सक्रिय होने की आवश्यकता बताई है और जागरण किए जाने की महत्वपूर्णता पर जोर दिया है।

DNA हिंदी में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत ने अपने UPSC इंटरव्यू में मजेदार किस्सा और उनके अनुभवों को साझा किया है। उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान पाए गए अनुभवों और सफलता के मार्गदर्शन के बारे में चर्चा की है।

इस लेख में आचार्य प्रशांत ने APB Live पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। उन्होंने अयोध्यावासियों के संदर्भ में बात की है और राम के नाम पर अज्ञान और अहंकार के बारे में चर्चा की है। उन्होंने यह भी कहा है कि इसमें दिल टूटने की कोई बात नहीं है। आचार्य प्रशांत ने राम के अर्थ को सत्य के रूप में समझाया।

इस लेख में आचार्य प्रशांत ने Times of India में अपने विचार व्यक्त किए हैं। उन्होंने बाबासाहेब अम्बेडकर के विरोध को समझाया है और यह प्रश्न उठाया है कि क्या आज के हिंदू उन्हें गलत समझ रहे हैं। उन्होंने बताया कि बाबासाहेब अम्बेडकर ने हिंदू धर्म में सुधार लाने के लिए कठोर प्रयास किए, लेकिन निराश होकर अपने जीवन के अंत में बौद्ध धर्म में धर्मांतरण किया।

आचार्य प्रशांत ने भारतीय राजनीति की वर्तमान स्थिति पर अपनी गहरी समझ साझा की है, नेताओं की विशिष्टताओं को उजागर करते हुए। उन्होंने सशक्त और नैतिक नेतृत्व की आवश्यकता पर जोर दिया, जो देश को समृद्धि और न्याय की दिशा में आगे बढ़ा सके। पढ़ें इस Daily Hunt लेख में उनकी विस्तृत विश्लेषण।

आचार्य प्रशांत ने लोकसभा चुनावों के संदर्भ में एक वायरल वीडियो में मतदाताओं से सावधानी बरतने की अपील की है। उन्होंने नेताओं से जलवायु परिवर्तन और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान देने की आवश्यकता पर जोर दिया है, जो अक्सर राजनीतिक एजेंडा में नजरअंदाज हो जाते हैं। इस दैनिक भास्कर लेख में उनकी अपील के प्रमुख बिंदुओं को जानें।

DNA हिंदी लेख में आचार्य प्रशांत ने लड़कियों को बाइक और कार चलाते देखकर मजाक उड़ाने वाले लोगों को चेताया है कि वे ऐसा न करें। उन्होंने कहा कि लड़कियां अभी इन वाहनों को चलाने में नई हैं और लड़कों की तुलना में कौशल में कमजोर हैं, लेकिन वक्त के साथ वे भी बेहतर होंगी और अपनी कमियों पर काबू पा लेंगी।

इस लेख में पाठकों को विस्तृत रूप से वर्णित किया गया है कि रामभोला और तुलसीदास के जीवन में कैसे राम के स्पर्श ने उन्हें तुलसीराम और तुलसीदास बना दिया। यह लेख प्रेरणादायक और तत्ववादी पहलूओं को समझाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस विशेष लेख को पत्रिका द्वारा पढ़ें।

आचार्य प्रशांत ने साधना न्यूज़ 24 के माध्यम से केसीसी कॉलेज में संत सरिता सम्मेलन में अपने विचार साझा किए। उन्होंने मन की सामग्री बदलने के महत्व को बताया और समझाया कि आध्यात्मिक सुधार के बिना जीवन में सकारात्मक परिवर्तन संभव नहीं है। पढ़ें इस प्रेरणादायक संदेश को साधना न्यूज़ 24 द्वारा।

आचार्य प्रशांत का जन्म उत्तर प्रदेश के आगरा में हुआ था। उन्होंने IIT दिल्ली से इंजीनियरिंग और IIM अहमदाबाद से मैनेजमेंट की पढ़ाई की। सिविल सेवा में काम करने के बाद, उन्होंने आध्यात्मिकता और शिक्षा की दिशा में मोड़ लिया। अब वे आद्वैत शिक्षक और प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं, जो अपने शिष्यों को गीता और उपनिषद के रहस्यों की शिक्षा देते हैं। उनके प्रेरणादायक जीवन के बारे में पढ़ें india.com पर।

इस लेख में आचार्य प्रशांत ने पत्रिका में व्यक्त किया है कि दूसरों के खिलाफ जाना आसान होता है, क्योंकि हम उनके गुण और कमज़ोरियों को आसानी से देख सकते हैं। लेकिन अपने खिलाफ जाना मुश्किल होता है, क्योंकि इसमें हमें अपने दोषों को स्वीकार करने की जरूरत होती है। उन्होंने यह भी समझाया है कि अध्यात्मिक राह पर चलना भी इसी तरह का सफर है, जिसमें हमें अपने अंदर की गहराईयों को समझने और स्वीकार करने के लिए मेहनत की आवश्यकता होती है।

इस लेख में आचार्य प्रशांत ने दैनिक जागरण में तुलसीदास के राम के गहरे अर्थ और उनकी व्याख्या पर प्रकाश डाला है। उन्होंने बताया है कि राम न केवल एक ऐतिहासिक और धार्मिक व्यक्तित्व हैं, बल्कि एक जीवन की वास्तविकता और आदर्श का प्रतीक भी हैं। लेख में तुलसीदास के राम की भक्ति, प्रेम और उनकी जीवन दृष्टि को विस्तृत रूप में समझाया गया है, जो आज के समाज में भी प्रासंगिक है।

आचार्य प्रशांत ने लोकदेश में लिखा है कि जैसे किसी ने कलेजा भींच रखा हो, और फिर जरा तुम तनाव मुक्त हो जाओ, जरा तुम आश्वस्त और स्वतंत्र अनुभव करो। आंसू अगर सच्चे हों तो भीतर आनंद ही आनंद है। उन्होंने यह बताने का प्रयास किया है कि वास्तविक भावनाएं और सच्ची भावुकता ही हमें आंतरिक शांति और सुख प्रदान कर सकती हैं। सच्चे आंसू एक ऐसी स्थिति को दर्शाते हैं जहां दिल हल्का होता है और मन को गहरा संतोष मिलता है।

आचार्य प्रशांत ने दैनिक जागरण में लिखा है कि जीवन में दुःख आएगा, और यह भी सत्य है कि दुःख चला जाएगा। वे कहते हैं कि जब तुम्हारे जीवन में दुःख आएगा, तो तुम्हारा रोना स्वाभाविक होगा, लेकिन जब दुःख चला जाएगा, तब भी तुम रो सकते हो। इसका मतलब यह है कि पहले आँसू दुःख के होते हैं और दूसरे आँसू दुःख से मुक्ति के होते हैं।

साहित्य आज तक के मंच पर आचार्य प्रशांत ने कहा कि जो दुनिया कर रही है, आपको करने के लिए कह रही है उसे परखो। परखने का अपना अधिकार कभी नहीं छोड़ना चाहिए। आचार्य प्रशांत ने युवाओं के बारे कहा,'युवा चाहते हैं कि जिंदगी का ऊंचे से ऊंचा इस्तेमाल करें, लेकिन उन्हें कहीं भी आदर्श नहीं दिख रहे होते हैं।

News 24 के मंच पर आचार्य प्रशांत ने कहा कि देखों, त्यौहार तो एक ही होता है और त्यौहार की रोशनी भी एक ही होती है। तो इनके अनुसार, दिवाली का मतलब जब मन रौशन हुआ तब दिवाली जानो।

आचार्य प्रशांत ने पत्रिका के इस लेख में कहा कि त्यौहार का मतलब होता है- ‘आप राम की ओर वापस गए।’ त्यौहार का मतलब होता है कि अंधेरे को रोशनी की सुध आ गई और अंधेरा जब रोशनी की तरफ मिटता है तभी उसके कदम बढ़ते हैं। दिवाली राम की कोई घर वापसी नहीं होती, आप की राम वापसी होती है।

TV9 के इस लेख में आचार्य प्रशांत कहते हैं की आंतरिक विभाजन का ही नाम रावण है और सत्य के अतिरिक्त, आत्मा के अतिरिक्त जो कुछ भी है वो विभाजित है. जहां विभाजन है, वहांं आप चैन नहीं पा सकते. राम का कोई केंद्र ही नहीं है, जो मुक्त आकाश का हो गया वही राम है. आकाश का केंद्र आप नहीं बता पाएंगे. आकाश में तो तुम जहां पर हो वहीं पर केंद्र है; अनंत है

आचार्य प्रशांत ने राष्ट्रीय सहारा में लिखा है कि नवरात्रि का समय शक्ति की समझ के लिए उपयुक्त है। वे बताते हैं कि शिव केंद्र और शिव सत्य का मतलब है कि शिव शाश्वत सत्य और शांति का प्रतीक हैं। वहीं, शक्ति जीवन का प्रतीक है, जो जीवन को ऊर्जा और गति प्रदान करती है। आचार्य प्रशांत के अनुसार, नवरात्रि के अवसर पर हमें शक्ति की इस महत्वपूर्ण भूमिका को समझना चाहिए और इसे अपनी जीवन यात्रा में एक मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार करना चाहिए।

आचार्य प्रशांत ने विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर लिखा है कि आज बहुत तेजी से बच्चे और व्यस्क, शिक्षा संबंधी या रोज़गार संबंधी असफलताओं के चलते अवसाद के शिकार बनते जा रहे हैं और फ़िर इसी अवसाद के चलते वे आत्महत्या करने का निर्णय तक ले लेते हैं, जो बहुत चिंताजनक और दुखदाई है।

आचार्य प्रशांत ने अमर उजाला के इस लेख में बताया है कि जीवन का असली संघर्ष बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि हमारे मन के विकारों से है। उन्होंने समझाया कि हमारा मानव जीवन कीमती है और इसे सही दिशा में ले जाने के लिए हमें अपने मन के विकारों को पहचानना और हटाना जरूरी है। लेख में आचार्य प्रशांत ने कहा कि हमारे मन में उठने वाले क्रोध, लालच, ईर्ष्या, और अन्य नकारात्मक भावनाओं को नियंत्रित करना असली संघर्ष है। उन्होंने जोर दिया कि आत्म-चिंतन और आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से हम अपने भीतर के इन विकारों से मुक्ति पा सकते हैं और सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक जीवन जी सकते हैं।

आचार्य प्रशांत ने सनातन धर्म और वेदांत के महत्व पर जोर देते हुए 1 अक्टूबर को "वेदांत दिवस" घोषित किया। भारत एक्सप्रेस के इस लेख में वेदों और उपनिषदों को धर्म का केंद्र मानते हुए उन्होंने कहा कि सनातन धर्म को पुनर्जीवित करने का एकमात्र तरीका उच्चतम ग्रंथों की प्रतिष्ठा है। उन्होंने "घर घर उपनिषद" अभियान शुरू किया है, जिसका उद्देश्य 20 करोड़ घरों तक उपनिषदों को पहुँचाना है। उनका मानना है कि वेदांत की पुनर्प्रतिष्ठा से जीवन का पुनर्प्रतिष्ठा होगा।

राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में, आचार्य प्रशांत ने सही और गलत के निर्णय लेने के महत्व पर प्रकाश डाला है। वे बताते हैं कि आत्म-जागरूकता और आत्म-चिंतन के माध्यम से सही निर्णय लेना महत्वपूर्ण है। सही निर्णय लेना एक कला है, जिसे आत्म-मूल्यांकन से सीखा जा सकता है।


आचार्य प्रशांत बताते हैं कि हम जन्म से ही दुख में जीते हैं और इसका सही ज्ञान नहीं होता। वे कहते हैं कि अपने दर्द को समझना ही सही मार्ग दिखा सकता है। इस लेख में आत्मज्ञान, संवेदनशीलता, और मन की स्थिरता पर जोर दिया गया है। राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में, यह बताया गया है कि अगर हम अपनी स्थिति का सटीक संज्ञान लें तो हमारी भटकन समाप्त हो सकती है।

इस ABP Live साक्षात्कार में, आचार्य प्रशांत बताते हैं कि कैसे हम जीवन के तथ्यों के बावजूद आशा लगाए रखते हैं। वे समझाते हैं कि कैसे नई संभावनाओं की उम्मीद हमें जीवनभर नचाती रहती है, जबकि हमें कम ही मिलता है, लेकिन मिलने की आशा बहुत ज्यादा बनी रहती है। आचार्य प्रशांत का यह दृष्टिकोण हमें आशा और वास्तविकता के बीच के संतुलन को समझने में मदद करता है।

आचार्य प्रशांत ने ABP Live को दिए इंटरव्यू में अपनी IIT और IIM प्रशासनिक सेवाओं को छोड़कर आध्यात्मिकता की ओर मुड़ने के कारणों पर चर्चा की। आचार्य प्रशांत ने आत्मज्ञान के महत्व पर जोर दिया, जिससे उन्हें इस मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिली।

आचार्य प्रशांत राष्ट्रीय सहारा में लिखते है छल को पहचानने के लिए निष्ठुर नजर चाहिए। कपटी व्यक्ति दूसरे कपटी को नहीं पहचान सकता। छल का मतलब है पुरानी जानकारी से मेल न खाना। अगर आपका कुछ बिगड़ता है और दूसरा छल करता है, तो इसका मतलब है कि आपने अपनी शांति खो दी है। जो निर्दोष है, उसका छल कुछ नहीं बिगाड़ सकता। छल-कपट से नुकसान तब होता है जब आप भी कपटी होते हैं। यह खेल है जिसमें हार-जीत चलती रहती है। शरीर और संसार के रिश्ते बनते और टूटते रहते हैं। छल से बचने के लिए इस खेल से बाहर निकलें, फिर कोई नुकसान नहीं होगा।

रक्षाबंधन का सही अर्थ समझाते हुए राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने कहा कि यह केवल भाई-बहन के बीच का पर्व नहीं है। विभिन्न पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में रक्षा के व्यापक अर्थ दिए गए हैं। आज हमें पर्यावरण, भाषा, संस्कृति और समाज की रक्षा की जरूरत है। यह पर्व हमें व्यापक दृष्टिकोण अपनाने और सभी कमजोर एवं जरूरतमंदों की रक्षा करने का संदेश देता है। आचार्य प्रशांत ने कहा कि हमें हर प्रकार की सुरक्षा और संरक्षण के लिए प्रयास करना चाहिए।

आचार्य प्रशांत ने यज्ञ के वास्तविक अर्थ पर चर्चा करते हुए दैनिक जागरण के इस लेख में बताया कि आज के समय में लोग यज्ञ का सही अर्थ नहीं समझते। यज्ञ का मतलब केवल पूजा-पाठ नहीं है, बल्कि यह आत्मिक और आध्यात्मिक शुद्धि का माध्यम है। यदि हम यज्ञ का सही मतलब नहीं जानते, तो इसका सही लाभ भी नहीं उठा सकते। यज्ञ के सही अर्थ को समझना और उसका पालन करना ही सच्ची भक्ति है।

आचार्य प्रशांत ने दैनिक जागरण के इस लेख में बताया कि हमारी परेशानियों का समाधान हमारे स्वयं के भीतर है। यदि हम अपनी वास्तविक समस्या को पहचानें और उसे सही तरीके से समझें, तो हम उसका सही समाधान पा सकते हैं। इधर-उधर भटकने और बाहरी उपायों पर निर्भर रहने के बजाय हमें अपने अंदर झांकने और समस्या के मूल कारण को समझने की आवश्यकता है। सच्ची शांति और समाधान तभी मिल सकता है जब हम अपनी समस्याओं का सामना ईमानदारी से करें।

आचार्य प्रशांत ने राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में शिक्षा व्यवस्था की खामियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह प्रक्रिया सही दिशा में नहीं चल रही है। बच्चों की मानसिक स्थिति का ध्यान रखे बिना उन्हें ज्ञान देने की कोशिश की जा रही है। हमें बच्चों की शिक्षा में स्वाध्याय और आत्मचिंतन को शामिल करना चाहिए। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि बच्चों की शिक्षा केवल जानकारी देने तक सीमित न हो, बल्कि उन्हें सही तरीके से सोचने और समझने के योग्य बनाए।

आचार्य प्रशांत ने असली जवानी का मतलब समझाते हुए राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में कहा कि यह केवल शारीरिक अवस्था नहीं है, बल्कि प्रेम, ऊर्जा, उत्साह और सपनों से भरी एक मानसिक और आत्मिक स्थिति है। असली जवानी तब होती है जब हम सच्चाई की ओर आकर्षित होते हैं और अपने आत्म-ज्ञान को पहचानते हैं। यह अवस्था व्यक्ति को जीवन में गहराई और स्थिरता देती है, जिससे वह अपने जीवन का सच्चा आनंद ले सकता है।

आचार्य प्रशांत ने दैनिक जागरण के इस लेख में बताया कि अध्यात्म एक अंतिम बिंदु का नाम है, जो सामान्य जीवन से बहुत अलग है। यह आत्म-जागरण और सच्ची समझ की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा कि शरीर और इस दुनिया में आना शुभ है, लेकिन असली शांति और खुशी अध्यात्म के माध्यम से ही प्राप्त होती है। अध्यात्म का अर्थ है, अपने सच्चे आत्म को जानना और अपने मूल उद्देश्य को समझना।

आचार्य प्रशांत ने वीगनिज्म के आध्यात्मिक आधार पर जोर देते हुए राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में कहा कि यदि वीगनिज्म सच्चा है, तो यह आत्मिक विकास का हिस्सा होना चाहिए। उन्होंने बताया कि दूसरे जीवों पर अत्याचार न करना और न्यूनतम हिंसा का पालन करना सच्चे वीगनिज्म का मूल है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने शरीर और आत्मा को शुद्ध रख सकता है, जिससे जीवन में सच्ची शांति और संतुष्टि प्राप्त होती है।

IBC24 के इस लेख में आचार्य प्रशांत लिखते है शरीर का जन्म वासना से होता है, और इसे गलत क्यों नहीं माना जाना चाहिए। लेख में तर्क दिया गया है कि आत्मा न तो जन्म लेती है न मरती है, और वासना से उत्पन्न होने वाले शरीर को सही रूप में समझने की आवश्यकता है। आध्यात्मिक दृष्टि से, शरीर को केवल एक वाहन मानना चाहिए, न कि अंतिम सत्य।

आचार्य प्रशांत ने राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में पुनर्जन्म को आत्मिक जागरूकता का प्रतीक बताते हुए कहा कि सच्चा पुनर्जन्म हमारे जीवन में गहराई से आत्म-जागरूकता प्राप्त करने से होता है। उन्होंने बताया कि हमें अपने कर्म, विचार और आत्मिक उद्देश्य पर ध्यान देना चाहिए ताकि हम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सकें।

आचार्य प्रशांत ने राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में जीवन में हौसले के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हर असफलता हमें नया सीखने और फिर से प्रयास करने का मौका देती है। निरंतर प्रयास और आत्मविश्वास हमें जीवन में सफलता दिला सकते हैं। हार को स्वीकार करना और उससे सीखना ही असली हौसला है। यह हमें मानसिक और आत्मिक रूप से मजबूत बनाता है और हमें अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।

राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने असली सुंदरता का महत्व बताते हुए कहा कि बाहरी सुंदरता की तुलना में आंतरिक सुंदरता अधिक महत्वपूर्ण है। बाहरी सुंदरता क्षणिक और सतही होती है, जबकि आंतरिक सुंदरता स्थायी और गहरी होती है। सच्ची सुंदरता वह है जो व्यक्ति के विचारों, कार्यों और आत्मा में झलकती है।

दैनिक भास्कर में प्रकाशित लेख के अनुसार ग्रेटर नोएडा में आयोजित 'गीता समागम' श्रृंखला के तीसरे अध्याय 'कर्मयोग' पर आचार्य प्रशांत ने सत्र का संचालन किया। इस सत्र में उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों को सरल और सहज भाषा में प्रस्तुत कर, आम लोगों के जीवन को अर्थपूर्ण और आसान बनाने की दिशा में मार्गदर्शन दिया।

आचार्य प्रशांत ने भाषा के महत्व पर जोर देते हुए राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में कहा कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन में उपयोगिता के आधार पर ही जीवंत रहती है। उन्होंने बताया कि भाषा की सही शिक्षा हमें आत्मनिर्भर और सक्षम बनाती है। सही तरीके से भाषा का प्रयोग करने से रोजगार और सामाजिक स्तर पर बेहतरी मिलती है। आचार्य प्रशांत ने विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से यह समझाया कि भाषा की वास्तविक उपयोगिता कैसे जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकती है।

आचार्य प्रशांत ने ग्रेटर नोएडा में संत सरिता श्रृंखला के दौरान बताया कि जीवन में बदलाव के लिए आत्मनिर्भरता आवश्यक है। राष्ट्रीय सहारा के अनुसार, उन्होंने कहा कि बाहरी स्थितियों को दोष देने के बजाय व्यक्ति को खुद जिम्मेदारी उठानी चाहिए।

राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने समाज में धर्म-परिवर्तन पर हो रहे विवाद पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि धर्म-परिवर्तन का फैसला आर्थिक या शारीरिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और सच्चे धर्म की खोज में होना चाहिए। सच्चा धर्म प्रेम, करुणा और आत्मज्ञान पर आधारित होता है। धर्म-परिवर्तन का निर्णय सोच-समझ कर और आत्म-विश्लेषण के बाद ही लेना चाहिए। आचार्य प्रशांत ने बताया कि बाहरी दिखावे या लाभ के लिए धर्म बदलना आत्मिक विकास में बाधा उत्पन्न कर सकता है।

IBC24 में प्रकाशित लेख में आचार्य प्रशांत ने कहा कि जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य अपनी मुक्ति और जगत का कल्याण है। अपनी मुक्ति के लिए आत्मज्ञान आवश्यक है, जिसे उपनिषदों और संतवाणी से प्राप्त किया जा सकता है। ग्रेटर नोएडा में जीएन ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट में आयोजित दो दिवसीय संत समागम में उन्होंने यह बातें साझा कीं। उन्होंने आत्मा से दूरी को दुख का मुख्य कारण बताया और गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला।

दैनिक भास्कर में प्रकाशित लेख के अनुसार आचार्य प्रशांत को IIT दिल्ली एलुमनी अवार्ड से सम्मानित किया गया है। एसोसिएशन के सचिव ने कहा कि आचार्य हमेशा से IIT दिल्ली परिसर की गरिमा बढ़ाते रहे हैं। यह अवार्ड उनके द्वारा किए गए उत्कृष्ट कार्यों और संस्थान के प्रति उनके योगदान को मान्यता देता है। आचार्य प्रशांत का यह सम्मान प्रेरणा का स्रोत है, जो छात्रों और एलुमनी को उनके आदर्शों का पालन करने के लिए प्रेरित करता है।

प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक और पूर्व सिविल सेवा अधिकारी आचार्य प्रशांत ने दैनिक भास्कर में प्रकाशित लेख के अनुसार कहा कि जीवन में करने योग्य एक ही काम है, अपनी मुक्ति और जगत का कल्याण। अपनी मुक्ति के लिए आत्मज्ञान जरूरी है। उसके लिए हमें उपनिषदों के पास आने होगा। सामान्यजन के लिए उपनिषदों का व्यवहारिक ज्ञान हमें संतवाणी से ही मिल सकता है।

स्पीकिंग ट्री के इस लेख में इला गोस्वामी आचार्य प्रशांत की पुस्तक 'माया' पर लिखती हैं। वे बताती हैं कि अक्सर हम सभी मनुष्यों के चित्त में उठने वाले सवाल एक जैसे ही होते हैं क्योंकि हम सभी आसपास जो महसूस कर रहे हैं, जिन चीज़ों के साथ हमारा तालमेल है और जिस सोच के साथ हम आगे बढ़ रहें हैं, वह सभी एक ही फैक्टर से प्रभावित होता है, वह है ‘माया’।

राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने धर्म-परिवर्तन पर हो रहे विवाद पर कहा कि यह आत्मिक शांति और सच्चे धर्म की खोज में होना चाहिए, न कि आर्थिक या शारीरिक लाभ के लिए। उन्होंने समझाया कि बाहरी दिखावे या लाभ के लिए धर्म बदलना आत्मिक विकास में बाधा उत्पन्न कर सकता है।

राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया पर विचार करते हुए बताया कि ये प्रकृति के खेल हैं, जिसमें कोई बदलाव नहीं होता। उन्होंने कहा कि आत्मा की सही खोज प्रकृति में नहीं, बल्कि आत्मज्ञान में है। बाहरी दुनिया में सत्य की खोज करने से व्यक्ति निराशा पाता है, जबकि आत्मज्ञान से ही सच्चे सुख और शांति की प्राप्ति होती है।

अमर उजाला में प्रकाशित लेख के अनुसार ऋषिकेश में प्रशांत अद्वैत संस्था के संस्थापक आचार्य प्रशांत ने दो दिवसीय कार्यशाला में समय के वैज्ञानिक महत्व पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि विचार और समय के बीच का संबंध साफ देखना होगा, तब ही हम जीवन के सबसे बहुमूल्य संसाधन समय का सम्यक उपयोग कर पाएंगे।

हिंदुस्तान न्यूज़ में प्रकाशित लेख के अनुसार प्रशांत अद्वैत संस्था के संस्थापक आचार्य प्रशांत ने ऋषिकेश में आयोजित कार्यक्रम में समय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि समय दुनिया में सबसे मूल्यवान है। प्रकृति बदलती है और समय के हिसाब से जीवन में बदलाव अनिवार्य है।



राष्ट्रीय सहारा के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि ध्यान में अपने-आप में कुछ भी नहीं है। ध्यान को जब भी कुछ बनाया जाएगा, तो ध्यान के साथ दुर्व्यवहार हो जाएगा। हमारा स्वभाव है ध्यान। ध्यान कोई क्रिया नहीं है। ध्यान का मतलब होता है कि कोशिश किए बिना, मन एकाग्रता की स्थिति में हो। ध्यान केवल आत्मसाक्षात्कार की स्थिति है, जिसमें मन का आत्मा से गहरा संबंध हो जाता है। ध्यान एक ऐसी स्थिति है, जिसमें मन बिना किसी प्रयास के, अपनी स्वाभाविक स्थिति में स्थिर हो जाता है।

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत लिखते हैं त्याग का मतलब है जो कुछ है, उसे पहचान कर उसका त्याग कर देना। सही मायनों में त्याग तिरस्कार नहीं है, वह हमारी जरूरतों से जुड़ा है। भारत में गलत तरीके से त्याग की अवधारणा को समझा गया है। त्याग केवल खाने-पीने का नहीं बल्कि अपने अंदर की गलत सोच और आदतों का भी त्याग करना है। त्याग का सही मतलब तभी समझ में आता है जब हम जीवन के प्रति अपनी सोच को बदलते हैं और सही दिशा में आगे बढ़ते हैं।

अमर उजाला में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत लिखते हैं अपना भला-बुरा सोचने-समझने की शक्ति आपको धीरे-धीरे हर हालात से लड़ना सिखा देती है और इस काबिल बना देती है कि आप दूसरों की परछाई से निकलकर अपने जीवन के अहम निर्णय खुद ले सकें। खुद पर दूसरों की सोच हावी नहीं होने दें और अपनी विचारधारा को स्पष्ट रखें। आलोचनाओं से प्रभावित हुए बिना अपने उद्देश्य की ओर आगे बढ़ें। अपनी ताकत और कमजोरियों को पहचानकर जीवन में आत्मनिर्भर बनें। आत्मनिर्भरता ही आपकी सच्ची शक्ति है।

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि जब तक व्यक्ति दुनिया के सामने रहता है, तब तक वह अपने वास्तविक स्व को नहीं देख पाता। ध्यान का अभ्यास करने से व्यक्ति अपने मन की गहराइयों में उतर सकता है और सच्ची आत्म-प्राप्ति कर सकता है। ध्यान से मन शांत होता है और आत्म-जागरूकता बढ़ती है, जिससे जीवन में शांति और संतुलन आता है। अकेलेपन को आत्मनिरीक्षण का अवसर मानकर अपनाएं, जिससे सच्चे आत्मबोध का अनुभव किया जा सके।

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि चेतना का हर स्तर हमें खुद के अधिक करीब लाता है। जागृत अवस्था में हम पूरी तरह से सतर्क रहते हैं, सुप्ति में कुछ हद तक अनभिज्ञ, और तुरीय में हम अपने शुद्धतम स्वरूप में होते हैं। यह यात्रा हमें हमारे भीतर की सच्चाई से अवगत कराती है, जिससे जीवन में सच्ची शांति और आनंद का अनुभव होता है।

आचार्य प्रशांत द्वारा लोकदेश में लिखा यह लेख शिवलिंग की पूजा के पीछे के आध्यात्मिक महत्व को स्पष्ट करता है। शिवलिंग चेतना का प्रतीक है। वे बताते हैं कि शिवलिंग की पूजा न केवल पौराणिक कथाओं में बल्कि हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं में भी गहरी अर्थवत्ता रखती है। शिवलिंग को चेतना और सृजनात्मक शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि द्वैत में जीने के लिए अद्वैत को भूलना जरूरी है। जब तक याद है, तब तक द्वैत है। अद्वैत से जुड़ा कोई अनुभव नहीं हो सकता, खासकर जब आत्मा के मुख से निकलता हो। राजा और बंदर की कहानी के माध्यम से वे समझाते हैं कि जब तक द्वैत है, तब तक चंचलता बनी रहती है। अद्वैत में सबकुछ शांत हो जाता है।

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि वेदांत की मूल बातें समझें: "सत्य एक है," जो अपनी लीलाओं, मुक्तियों, और स्वेच्छाओं में अनेक रूपों में अभिव्यक्त होता है। वेदांत के अनुसार, अभिव्यक्त होना सत्य का स्वभाव है। अर्जुन की तरह हमें अपने भीतर की त्रिगुणात्मकता को पहचानना चाहिए और उसके पार जाना चाहिए। जब तक हम अपने मन को नियंत्रित नहीं करते, तब तक विवेक नहीं प्राप्त कर सकते।

राष्ट्रीय हिंदी मेल के इस लेख में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि हमें सबसे कठिन काम को प्राथमिकता देनी चाहिए। कठिनाइयों का सामना करने से आत्म-विकास और दृढ़ता का निर्माण होता है। समस्याओं से निपटते समय हमें धैर्य, आत्म-संयम, और निरंतर प्रयास की आवश्यकता होती है। इस प्रक्रिया में अन्य कार्य भी सहजता से पूर्ण हो जाते हैं।

आचार्य प्रशांत के अनुसार प्रेम और मृत्यु साथ-साथ चलते हैं, जो जीवन के अमर पहलू हैं। राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस लेख में आचार्य बताते हैं प्रेम का सच्चा अर्थ है परम आनंद प्राप्त करना, जिसमें भौतिकता और आसक्ति का कोई स्थान नहीं। सच्चे प्रेम को समझने और आत्मसात करने के लिए हमें स्वयं को संकीर्णता और भ्रम से मुक्त करना होगा।


इस लेख में आचार्य प्रशांत ने गहराई से विश्लेषण किया है कि क्यों गलत आदतें और विचारधाराएं हमारे जीवन से हटने का नाम नहीं लेतीं। उन्होंने बताया कि गलतियों को पकड़कर रखने का कारण हमारा मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक जकड़न है। लेख में आचार्य प्रशांत ने आत्मनिरीक्षण और आत्मज्ञान के माध्यम से इन गलतियों से मुक्ति पाने के उपाय सुझाए हैं। - Loledg

यह लेख दैनिक भास्कर में आचार्य प्रशांत की शिक्षाओं के अनुसार, अध्यात्म को एक आंतरिक यात्रा के रूप में प्रस्तुत करता है। यह उन लोगों के लिए है जो भौतिकता से संतुष्ट नहीं हैं और जिनमें विवेक, वैराग्य, और मुक्ति की तीव्र इच्छा है। आत्म-जागरूकता के माध्यम से, हम अपने जीवन में गहराई और सच्ची संतोष की खोज कर सकते हैं।

"दैनिक लोकदेश" में प्रकाशित इस लेख में बताया गया है कि आचार्य प्रशांत को पेटा ने 2022 का 'मोस्ट इन्फ्लुएंशियल वीगन' अवार्ड प्रदान किया। उन्हें पशु अधिकारों, पर्यावरण संरक्षण और अहिंसा पर आधारित उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए सम्मानित किया गया है। आचार्य प्रशांत ने इस अवसर पर कहा कि अहिंसा एक सशक्त आध्यात्मिक मार्ग है और उन्होंने शुद्ध शाकाहार को अपनाने की प्रेरणा दी।

दैनिक भास्कर - यह लेख आचार्य प्रशांत की शिक्षाओं के माध्यम से यह दर्शाता है कि दुःख केवल असली इच्छाओं की अप्राप्ति है, और इस ज्ञान के अभाव में मनुष्य दुख भोगता है। लेख में यह बताया गया है कि सतही सुखों से वास्तविक दुःख का समाधान नहीं होता; असली मुक्ति के लिए हमें अपने भीतर के दुःख का सामना करना होगा। अंत में, यह हमें अपने भीतर के दुःख की असलियत को पहचानने और उसे छोड़ने का पाठ पढ़ाता है।

आचार्य प्रशांत ने "मयूर संवाद" में बताया कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल के लिए उन्हें उनकी स्वाभाविकता और मौलिकता के साथ बढ़ने देना चाहिए। उन्होंने कहा कि बच्चों पर शैक्षिक सफलता का बोझ डालने के बजाय, उनके खेल-कूद और रचनात्मकता को प्रोत्साहित करना जरूरी है। बच्चों को उनके तनाव से मुक्त करने के लिए उन्हें अपनी रुचियों को खोजने और उनके अनुसार बढ़ने का अवसर देना चाहिए।

दैनिक भास्कर के इस लेख में आचार्य प्रशांत ने दुःख की मूल प्रकृति और उसकी परिभाषा को स्पष्ट किया है। उन्होंने बताया है कि असली कामना की अप्राप्ति ही दुःख है, जबकि नकली सुख क्षणिक होता है। दुःख से मुक्ति के लिए अपने भीतर के दुःख के मूल को पहचानना और उस पर काम करना आवश्यक है।

दैनिक भास्कर - आचार्य प्रशांत के इस लेख में मन की स्थिति और आंतरिक विकास पर गहरा विमर्श किया गया है। उन्होंने उपनिषदों और वेदांत के महत्व को उजागर करते हुए बताया कि वर्तमान में लोग सतही बातों में उलझे हुए हैं, जबकि वास्तविक आध्यात्मिक ज्ञान की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। आचार्य प्रशांत का यह संदेश है कि आंतरिक विकास के लिए ज्ञान की गहराई में जाना आवश्यक है।

"स्वतंत्र चेतना" में आचार्य प्रशांत ने इंटरनेट के युग में किताबों की घटती लोकप्रियता पर चिंता जताई है। उन्होंने बताया कि डिजिटल मीडिया और मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव के कारण किताबों की बिक्री में भारी गिरावट आई है। आचार्य प्रशांत ने कहा कि किताबें गहन ज्ञान और आत्म-विश्लेषण के लिए आवश्यक हैं, और उनके बिना समाज में गंभीरता और समझ का अभाव हो सकता है।

"दैनिक लोकदेश" में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत ने ग्लोबल वार्मिंग के खतरों पर प्रकाश डाला है। उन्होंने बताया कि हम लगातार विनाश की ओर बढ़ रहे हैं और इसे रोकने के लिए तुरंत कार्रवाई की आवश्यकता है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक प्रयासों पर जोर दिया, ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित और स्वस्थ पर्यावरण मिल सके।

"दैनिक लोकदेश" में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत ने नई कहानी लिखने की प्रेरणा दी है। उन्होंने कहा कि बदलाव लाने के लिए जागरूक होना जरूरी है और हमें अपने पुराने विचारों और प्रथाओं को बदलने की हिम्मत करनी चाहिए। आचार्य प्रशांत ने बताया कि अगर हम बड़े बदलाव की चाह रखते हैं, तो हमें खुद को और समाज को बदलने के लिए आगे आना होगा और नए दृष्टिकोण अपनाने होंगे।

नॉएडा व्यूज - आचार्य प्रशांत के इस लेख में मन की स्थिति और आंतरिक विकास पर गहरा विमर्श किया गया है। उन्होंने उपनिषदों और वेदांत के महत्व को उजागर करते हुए बताया कि वर्तमान में लोग सतही बातों में उलझे हुए हैं, जबकि वास्तविक आध्यात्मिक ज्ञान की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। आचार्य प्रशांत का यह संदेश है कि आंतरिक विकास के लिए ज्ञान की गहराई में जाना आवश्यक है।

आचार्य प्रशांत ने "दैनिक भास्कर" में बताया कि मांसाहार से पृथ्वी पर असंतुलन बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि मांसाहार न केवल पशुओं के प्रति क्रूरता है, बल्कि पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। आचार्य प्रशांत ने समझाया कि शाकाहार अपनाने से हम न केवल अपने स्वास्थ्य का ध्यान रख सकते हैं, बल्कि पृथ्वी की रक्षा भी कर सकते हैं।

रॉयल बुलेटिन - आचार्य प्रशांत के अनुसार, भागवत पुराण 18 पुराणों में सबसे प्रचलित और सम्मानित है, जिसमें वेदों और उपनिषदों के गूढ़ सिद्धांतों को सरल कहानियों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। इस पुस्तक में आचार्य प्रशांत ने भागवत पुराण की चुनिंदा कथाओं की वेदांत-सम्मत व्याख्या की है, जो पाठकों को पौराणिक कहानियों के गूढ़ अर्थों से परिचित कराती है। यह व्याख्या आध्यात्मिकता के निरंतर पतन के बीच एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति की दिशा में एक कदम है।

"लोकदेश" में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत ने कहा कि आध्यात्म संसार में आने का नहीं, बल्कि अंतिम विदाई का नाम है। उन्होंने समझाया कि सच्चा आध्यात्म व्यक्ति को माया और भ्रम से मुक्त करता है। आचार्य प्रशांत ने आत्मज्ञान की राह पर चलने और भौतिक इच्छाओं को त्यागने की आवश्यकता पर जोर दिया।

आचार्य प्रशांत ने तीन दिवसीय वेदान्त महोत्सव में विज्ञान और आत्म-जागरूकता पर व्याख्यान दिया, जहां उन्होंने उपस्थित लोगों के सवालों के समाधान भी किए। आईआईटी और आईआईएम के पूर्व छात्र आचार्य प्रशांत ने गहरी अंतर्दृष्टि के साथ मानव मन पर बात की। इस महोत्सव ने आईआईटी दिल्ली के पूर्व छात्रों का ध्यान आकर्षित किया और इसे सबसे प्रशंसित आयोजनों में से एक माना गया। - पंजाब केसरी

नवोदय टाइम्स - आचार्य प्रशांत, आईआईटी और आईआईएम के पूर्व छात्र, ने वेदान्त महोत्सव में "विज्ञान और आत्म-जागरूकता" पर व्याख्यान दिया। आई.आई.टी. दिल्ली के पूर्व छात्र संघ के अध्यक्ष ने उनके प्रवचनों की सराहना की। आयोजन समिति ने वेदान्त महोत्सव की सफलता पर गर्व जताया।

आचार्य प्रशांत ने "लल्लनटॉप" के न्यूज़ रूम में एक विशेष बातचीत में अपनी अद्वितीय दृष्टि साझा की। इस सत्र में उन्होंने आत्म-जागरूकता, विज्ञान, और जीवन के गहरे रहस्यों पर चर्चा की। उनके विचारों ने दर्शकों को नई सोच और प्रेरणा प्रदान की। इस सत्र में उनकी ज्ञानवर्धक अंतर्दृष्टि से भरपूर संवाद ने सभी को प्रभावित किया।

दैनिक भास्कर - आचार्य प्रशांत के अनुसार, शाकाहार केवल एक आहार प्रणाली नहीं, बल्कि एक विचारधारा है जो जीवन के प्रति संवेदनशीलता और करुणा को प्रोत्साहित करती है। दैनिक भास्कर के इस लेख में वे सिखाते हैं कि शाकाहार अपनाकर हम न केवल अपने स्वास्थ्य को सुधार सकते हैं, बल्कि पर्यावरण और पशु कल्याण में भी योगदान दे सकते हैं।

राष्ट्रीय हिन्दी मेल - आचार्य प्रशांत के अनुसार, जन्माष्टमी को श्री कृष्ण के जन्मदिवस के रूप में न मनाएं। श्रीकृष्ण का संदेश है कि जन्म-मृत्यु का कोई अस्तित्व नहीं है। इस अवसर पर, अपने भीतर देखें और आत्म-जागरूकता की ओर कदम बढ़ाएं। हर पर्व आपको बदलने और जीने का अवसर देता है। कृष्ण को न झुलाएं, बल्कि अपनी वास्तविकता का सामना करें।

दैनिक भास्कर - आचार्य प्रशांत के अनुसार, असली संतोष अपने अंदर खोजें। संतोष जीवन का अनमोल धन है, और इसे बाहरी दुनिया से नहीं, बल्कि आत्मा की गहराइयों से प्राप्त किया जा सकता है। The Health Site के इस लेख में आचार्य प्रशांत के विचारों के माध्यम से संतोष पाने के उपायों पर प्रकाश डाला गया है।

अवसाद से मुक्ति के लिए आचार्य प्रशांत ने 5 कारगर उपाय साझा किए हैं। अंधी कामनाओं से बचें, आत्मज्ञान की ओर बढ़ें, और यादों के जाल में न उलझें। तनाव से भागने के बजाय उसे झेलने की क्षमता बढ़ाएं और सार्थक लक्ष्य चुनें, जो जीवन को दिशा और अर्थ प्रदान करे। (मीडिया हाउस: द हेल्थ साइट)

राष्ट्रवादी - ग्रेटर नोएडा के अद्वैत बोधस्थल में आचार्य प्रशांत और मेनका गांधी के बीच पशुकल्याण वार्ता हुई, जिसमें युवा स्वयंसेवियों को जागरूक किया गया। आचार्य प्रशांत ने पशु हिंसा के खिलाफ आवाज उठाई, जिससे सकारात्मक बदलाव की उम्मीद जगी। प्रशांत अद्वैत संस्था अगला वेदांत महोत्सव 15 से 17 जुलाई को गोवा में आयोजित करने जा रही है।

दैनिक भास्कर - आचार्य प्रशांत का संदेश: जीवन में सच्ची शांति की खोज में भौतिक चीजों का मोह त्यागना आवश्यक है। इस छवि में दिखाया गया एक सरल विचार हमें याद दिलाता है कि आंतरिक संतोष से बढ़कर कुछ नहीं।

राष्ट्रीय हिंदी मेल - आचार्य प्रशांत ने महिला सशक्तिकरण पर जोर देते हुए कहा कि महिलाओं को हर क्षेत्र में समान अवसर मिलना चाहिए। उनके विचारों से स्पष्ट होता है कि समाज में असली बदलाव तभी आएगा जब हम महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करेंगे।

"जन विचार प्रवाह" में प्रकाशित संपादकीय में आचार्य प्रशांत ने सनातन धर्म की गहरी समझ की आवश्यकता पर बल दिया है। उन्होंने बताया कि धार्मिकता का असली अर्थ बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि इसकी आंतरिक गहराई में छिपा है। यह लेख धार्मिक शिक्षा और जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ सनातन धर्म के सच्चे अर्थ को जानने और समझने की प्रेरणा देता है।

"जन विचार प्रवाह" में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत ने वेदों को ज्ञान की पूरी शृंखला के रूप में वर्णित किया है। उन्होंने बताया कि वेद केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन की संपूर्णता को समझने के साधन हैं। वेदों में जीवन के विभिन्न पहलुओं, जैसे विज्ञान, दर्शन, और आत्मज्ञान के बारे में विस्तृत ज्ञान समाहित है, जो आज भी प्रासंगिक है।

"राष्ट्रीय हिन्दी मेल" में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत ने आत्म-विश्लेषण की महत्ता पर प्रकाश डाला है। उन्होंने बताया कि हम स्वयं ही अपने सबसे बड़े मित्र और शत्रु होते हैं, और हमारी आंतरिक सोच और दृष्टिकोण हमारे जीवन के परिणामों को निर्धारित करते हैं। यह लेख आत्म-जागरूकता और आत्म-विकास के महत्व पर जोर देता है।

"दैनिक भास्कर" में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत ने कहा कि अर्जुन की विजय श्रीकृष्ण के बिना संभव नहीं थी। उन्होंने समझाया कि जीवन के युद्ध में जीतने के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन और आंतरिक शांति आवश्यक है, जिसे केवल श्री कृष्ण जैसी दिव्यता प्रदान कर सकती है। यह लेख आत्मज्ञान और मार्गदर्शन की महत्ता पर जोर देता है।

"सच कहूँ" में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत की संस्था द्वारा किए गए प्रयासों से 50 लाख लोगों के मांसाहार छोड़ने की प्रेरणादायक कहानी बताई गई है। आचार्य प्रशांत ने जागरूकता और शाकाहार के लाभों को उजागर करते हुए युवाओं में बड़े बदलाव को प्रोत्साहित किया है। यह लेख पशु अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण के महत्व पर भी जोर देता है, जिससे समाज में सकारात्मक परिवर्तन आ रहा है।


"उत्तर भारत टाइम्स" में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत ने बताया कि आत्मा के मंथन से उत्पन्न ज्ञानाग्नि ही अज्ञानता को समाप्त कर सकती है। उन्होंने कहा कि आत्मा की गहराइयों में जाकर आत्म-ज्ञान प्राप्त करना ही सच्चा समाधान है। यह लेख आत्म-साक्षात्कार और आत्म-ज्ञान की महत्ता पर जोर देता है, जिससे जीवन की चुनौतियों का सामना किया जा सकता है।

आचार्य प्रशांत ने "राष्ट्रीय हिन्दी मेल" में बताया कि सत्कार्य के लिए केवल एकाग्रता नहीं, बल्कि एकनिष्ठता आवश्यक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मन को सही दिशा में केंद्रित करना और उद्देश्य के प्रति पूर्ण समर्पण ही सफलता की कुंजी है। सही दिशा में केंद्रित और समर्पित मन ही जीवन में सच्ची संतुष्टि और शांति प्राप्त करता है।

आचार्य प्रशांत ने "तरुण मित्र" में प्रकाशित इस लेख में बताया कि व्यर्थ चीजों को जीवन से हटाना ही सच्चा आध्यात्म है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जीवन को सरल और सार्थक बनाने के लिए अनावश्यक वस्तुओं और विचारों को त्यागना चाहिए। यह लेख आत्म-साक्षात्कार और आंतरिक शुद्धता के महत्व को उजागर करता है, जिससे व्यक्ति सच्ची शांति प्राप्त कर सकता है।

"हिन्द सागर" में प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत ने कहा कि व्यर्थ चीजों को जीवन से हटाना ही सच्चा आध्यात्म है। उन्होंने बताया कि जीवन को सरल और सार्थक बनाने के लिए अनावश्यक वस्तुओं और विचारों को त्यागना चाहिए। आचार्य प्रशांत ने आत्म-शुद्धि और आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए कहा कि केवल आवश्यक और मूल्यवान चीजों पर ध्यान केंद्रित करने से ही सच्ची शांति और संतोष प्राप्त किया जा सकता है।

"राष्ट्रीय हिन्दी मेल" में आचार्य प्रशांत ने बताया कि मन हमेशा उलझन में क्यों रहता है। उन्होंने कहा कि यह उलझन हमारी आंतरिक और बाहरी असंगतियों का परिणाम है। आचार्य प्रशांत ने इस पर बल दिया कि जब तक हम अपने भीतर की सच्चाई को नहीं समझते और स्वीकारते, तब तक हमारा मन शांत नहीं हो सकता। लेख में उन्होंने आत्म-ज्ञान और सच्चाई की राह पर चलने की महत्ता पर जोर दिया है, जिससे मन की उलझनें समाप्त हो सकती हैं।

"स्वतंत्र चेतना" में आचार्य प्रशांत ने कहा कि पूरी दुनिया के सभी लोग छुपे हुए दर्द में जी रहे हैं। उन्होंने बताया कि यह दर्द हमारे भीतर की अपूर्णता और आत्मा की शांति की कमी का परिणाम है। आचार्य प्रशांत ने कहा कि जब तक हम इस दर्द को पहचानते और स्वीकारते नहीं, तब तक सच्ची शांति प्राप्त नहीं कर सकते। लेख में उन्होंने आत्मज्ञान और आंतरिक शांति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी है।

"एक्सप्रेस न्यूज" में आचार्य प्रशांत ने बताया कि मृत्यु जीवन का परम सत्य है और इसे झुठलाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि जीवन की अनिश्चितता और मृत्यु की अनिवार्यता को समझना ही सच्चा ज्ञान है। आचार्य प्रशांत ने इस सत्य को स्वीकारने की महत्ता पर जोर देते हुए कहा कि इससे हमें जीवन के वास्तविक अर्थ और उद्देश्य का बोध होता है। उन्होंने लोगों को आत्मज्ञान की दिशा में आगे बढ़ने और जीवन के हर पल को सार्थक बनाने की प्रेरणा दी।



"अर्जुनों को है श्रीकृष्ण की आवश्यकता" शीर्षक से प्रकाशित इस लेख में आचार्य प्रशांत ने अपनी नई पुस्तकों 'महाभारत' और 'अद्भुत गीता' का विमोचन किया। उन्होंने बताया कि महाभारत और श्रीकृष्ण की शिक्षाएँ आज भी प्रासंगिक हैं और आधुनिक अर्जुनों को सही मार्गदर्शन प्रदान कर सकती हैं। आचार्य प्रशांत ने इन पुस्तकों के माध्यम से गीता के गहन ज्ञान और महाभारत की गाथाओं को सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किया है, जिससे पाठक जीवन के विभिन्न पहलुओं को बेहतर ढंग से समझ सकें।

आचार्य प्रशांत ने कहा कि युवा पीढ़ी ही समाज और राष्ट्र में बदलाव लाने में सक्षम है। उन्होंने युवाओं को जागरूकता और सक्रियता के माध्यम से समाज सुधार के लिए प्रेरित किया। आचार्य ने युवाओं को जिम्मेदारी, और आत्म-ज्ञान की महत्वपूर्णता समझाते हुए कहा कि वे अपने प्रयासों से समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। -उत्तराखंड क्षेत्रीय समाचार पत्र

आचार्य प्रशांत ने हाल ही में "भारत आध्यात्म दर्शन राष्ट्र" पुस्तक का विमोचन किया और कहा कि संगति का महत्व जीवन में अत्यधिक है। उन्होंने यह भी बताया कि उनकी संस्था मानव चेतना को जागृत करने के लिए कार्यरत है और युवाओं को पढ़ाई की ओर आकर्षित करने हेतु "घर घर उपनिषद" कार्यक्रम शुरू कर रही है। -INext LIVE Dainik Jagran

आईआईटी दिल्ली में आयोजित अचार्य प्रशांत के वेदान्त महोत्सव में, प्राचीन शास्त्रों और आधुनिक जीवन के बीच अद्वितीय संगम देखने को मिला। आत्मज्ञान की दिशा में यह कार्यक्रम एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। विस्तृत जानकारी के लिए India Inside का यह लेख पढ़ें। -India Inside






स्वतंत्र चेतना अखबार के अनुसार, अष्टावक्र महोत्सव में आचार्य प्रशांत ने गीता के सार को आज के संदर्भ में प्रासंगिक बताया। उन्होंने बताया कि गीता जीवन की गहरी समझ देती है और इसे सही तरीके से समझने से आज भी हमारे जीवन की समस्याओं का समाधान संभव है। उन्होंने युवाओं को गीता का अध्ययन करने और इसके उपदेशों को अपने जीवन में लागू करने की प्रेरणा दी। कार्यक्रम के दौरान अनेक साधक उपस्थित थे, जिन्होंने गीता के ज्ञान से लाभान्वित होने का अनुभव किया।

स्वतंत्र चेतना समाचार पत्र में आचार्य प्रशांत ने बताया कि जीवन की कठिनाइयों का हल धैर्य और सही दृष्टिकोण से संभव है। उन्होंने कहा कि सच्ची खुशी बाहरी स्थितियों पर नहीं, बल्कि हमारे आंतरिक दृष्टिकोण पर निर्भर करती है। आत्मनिरीक्षण और सही मार्गदर्शन से जीवन सुखमय बनाया जा सकता है। उनके ये विचार अनुयायियों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं।


"स्वतंत्र चेतना की रिपोर्ट के अनुसार, स्वर्ण मंदिर में आयोजित स्वतंत्र नंद आश्रम के अहिंसा महोत्सव के दूसरे दिन आचार्य प्रशांत ने अपने अनुयायियों को संबोधित करते हुए भगवद गीता के सार को वर्तमान जीवन के लिए प्रासंगिक बताया। उन्होंने बताया कि कैसे गीता की शिक्षाएँ आज भी हमें जीवन में सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं और हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं को सही दृष्टिकोण से देखने का दृष्टिकोण देती हैं।



"पत्रिका के अनुसार, अचार्य प्रशांत फाउंडेशन ने ऑनलाइन पुस्तकों को केवल 1 रुपये में उपलब्ध कराया। इस पहल का उद्देश्य आत्मबोध और आध्यात्मिक शिक्षा को सुलभ बनाना है, ताकि अधिक से अधिक लोग इसका लाभ उठा सकें।

नवभारत टाइम्स के अनुसार, अचार्य प्रशांत प्रशासनिक अधिकारी के पद से इस्तीफा देने के बाद युवाओं को आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर कर रहे हैं। उनकी शिक्षाएँ आत्मबोध और जीवन में सच्ची शांति प्राप्त करने की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करती हैं।

दैनिक भास्कर के अनुसार, अचार्य प्रशांत ने कहा कि लोग अभी भी शाकाहार का वास्तविक अर्थ समझने से वंचित हैं। उन्होंने शाकाहार को आत्मबोध और नैतिकता से जोड़कर समझाया। उनकी शिक्षाएँ हमें अपने जीवन और पर्यावरण के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती हैं।


पत्रिका के अनुसार, अचार्य प्रशांत ने पुराने हिंदू ग्रंथों का ज्ञान साझा करते हुए उन्हें जीवन में लागू करने के तरीके बताए। उनकी शिक्षाएँ प्राचीन शास्त्रों की गूढ़ता को सरलता से प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने आत्मबोध और आत्मज्ञान की दिशा में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान किया।

जनसत्ता के अनुसार, अचार्य प्रशांत ने महाशिवरात्रि पर शिव को ब्रह्म सत्य के रूप में व्याख्या की। उनकी शिक्षाओं ने शिव की वास्तविकता को आत्मबोध और जीवन की सच्चाई से जोड़कर समझाया। उन्होंने बताया कि शिव की उपासना आत्मज्ञान की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है।

जनसत्ता के अनुसार, अचार्य प्रशांत ने बसंत पंचमी पर विद्या और अविद्या की महत्ता को उजागर किया। उनकी शिक्षाओं ने उपनिषदों के माध्यम से आत्मबोध और जीवन की सच्चाई को समझने पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि सच्ची विद्या वही है जो हमें आत्मज्ञान की दिशा में ले जाए।

द इंडियन वायर के अनुसार, अचार्य प्रशांत ने अपने जीवन के विभिन्न चरणों में आत्मबोध और आध्यात्मिकता को केंद्रित किया। उनकी शिक्षाएँ आत्मज्ञान की दिशा में युवाओं को मार्गदर्शन देती हैं। उन्होंने आधुनिक जीवन की चुनौतियों को प्राचीन शास्त्रों के माध्यम से समझने और समाधान खोजने पर जोर दिया।

रैपिडलीक्स हिंदी के अनुसार, अचार्य प्रशांत ने अपने जीवन के विभिन्न चरणों में आत्मबोध और आध्यात्मिकता को केंद्र में रखा। उनकी शिक्षाएँ युवाओं को आत्मज्ञान और जीवन की गहरी समझ की दिशा में मार्गदर्शन देती हैं। उन्होंने आधुनिक जीवन की चुनौतियों का समाधान प्राचीन शास्त्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया।



